Monday, August 6, 2018

रुद्रनाथ जी यात्रा भाग 1


पंच केदार में एक रुद्रनाथ जी के बारे में अभी तक पढ़ा और सुना ही था और हिमालय की गोद में बसा भगवान महादेव जी का यह स्थल अत्यंत दुर्गम एवं कठिन यात्रा मानी जाती है।
विगत समय से इस यात्रा को करने की मेरी प्रबल इच्छा थी क्योंकि पंच केदारों के साथ-साथ यह हिमालय की गोद में बसा है और मै खुद एक हिमालय वासी हूँ अतः निश्चय किया कि यह यात्रा की जाय वो भी सावन (सौण) के महीने में इस यात्रा में 4 जने यात्रा के लिए तैयार थे वैसे सावन के महीने में हिमालय पहाड़ो में यात्रा करना अपने आप में किसी कठिन परीक्षा से कम नही है अतः 5 अगस्त से यात्रा हमने शुरू की मेरे साथ मेरे दो जीजा जी श्री रावत जी श्री बिष्ट जी और मेरे मित्र नेगी जी भी तैयार हो गए।
सुबह 10.30 नंदप्रयाग धाट में पहुँचे ही थे भोलेनाथ ने हमारी परीक्षा शुरू कर दी पुरे 5 घण्टे सड़क पर मलबा आने से जाम में फंस गए और ऊपर से मौसम खराब साथ ही मौसम विभाग का अलर्ट की पूरे 72 घण्टे भारी बारिश और ये 72 घण्टे हमारे अब शुरू होने वाले थे वो भी पहाड़ो में।

वैसे गोपेश्वर पहुँचने पर भारी बारिश हमारा इंतजार कर रही थी। यहाँ दोपहर का खाना खाया और निकल।पड़े।
गोपेश्वर से पांच किलोमीटर आगे चलते ही सग्गर मिल गया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अरे! सग्गर तो इसी सडक पर है। हम रुके, स्थानीयों से पक्का कर लिया कि यही सग्गर है और यहीं से रुद्रनाथ का रास्ता जाता है। यहां से दस किलोमीटर आगे इसी सडक पर मण्डल है और फिर यही सडक आगे चोपता और ऊखीमठ चली जाती है।
शाम के साढ़े चार बजे थे। अभी भी दो घण्टे तक रोशनी रहेगी, इसलिये आगे बढा जा सकता है। दुकान वाले ने बताया कि यहां से चार किलोमीटर आगे पुंग बुग्याल है। वहां रुकने का इंतजाम है। उससे ढ़ाई-ढ़ाई
किलोमीटर आगे अगले ठिकाने है। रास्ता चढाई भरा है, यह तो सग्गर से दिख ही रहा था। चार किलोमीटर यानी दो घण्टे। इसका मतलब आज हम पुंग बुग्याल या उससे आगे ठिकानों में रुकेंगे। ठीक साढ़े चार बजे हम चल दिये।
आज का ज्यादातर पैदल रास्ता बसावट से होकर जाता है। चारों तरफ हरे-भरे खेत बडे अच्छे लग रहे थे। बारिश और बादलों संग हम आगे बढते गए।
इसी दौरान एक जंगली बिल्ली दिखी जो कौवे का शिकार करके भागी चली जा रही थी।
दो किलोमीटर बाद एक विश्राम शेड मिला। यहां पहुंचे तो थकान से चूर-चूर हो रहे थे, सोच थोड़ा चाय की चुस्की ले ले।
फिर यहां से पथराई चट्टानों से चढ़ाई की शुरुआत हुई जो वीरान जंगलो से होकर गुजरता है
पांच बजकर पचास मिनट पर जब पुंग बुग्याल में प्रवेश किया।

आइडिया एयरटेल वोडाफ़ोन पुंग बुग्याल में काम करते हैं।  घने जंगल से घिरा हुआ यह छोटा सा बुग्याल है। बुग्याल का अर्थ होता है घास का मैदान। ये छोटे छोटे भी होते हैं और बडे-बडे विशाल भी। विशाल बुग्याल अक्सर 3000 मीटर से 4000 मीटर के बीच में मिलते हैं जैसे दयारा, बेदिनी आदि; जबकि 3000 मीटर से कम ऊंचाई पर जंगलों में छोटे-छोटे बुग्याल मिलते हैं।

सग्गर (30°26’20.05”, 79°19’12.63”) समुद्र तल से 1670 मीटर ऊपर है जबकि पुंग बुग्याल (30°27’11.21”, 79°20’05.27”) की ऊंचाई 2255 मीटर है। यानी 4 किलोमीटर में ही 585 मीटर की ऊंचाई। निश्चित ही यह काफी तेज चढाई है।
यहां थकान भी लगी हुई थी तो चाय पिने का मन हुआ जैसे ही गरमा गरम चाय मिली मज़ा आया पता नही ऐसी चाय की आवश्यक्ता पहले कब महसूस हुई। पता नहीं देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसा होता है या नहीं लेकिन मेरे हिमालय में यही होता है। आप थके-हारे किसी लकडी और फूस की दुकान में पहुंचते हो और आपको बिना कहे चाय मिल जाये- बस यही आनन्द की पराकाष्ठा है। फिर पुंग बुग्याल जैसी जगह हो। चारों तरफ घना जंगल- भालुओं, तेंदुओं और बारहसिंहों से घिरा- और आप अँधेरे से पहले किसी लकड़ी की झोपडी में बैठे हो और आपको चाय मिल जाये। अभी हमारे पास थोडा समय था सोचा कल के लिए दुरी कुछ कम की जाय अतः हमने पुंग बुग्याल से सफर जारी करने का निर्णय लिया यहां से 5 किलोमीटर की दुरी पर मौली खरक है घने जंगलों और पानी के गाड़ गधेरों को तरते हुए खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए सांसे ऐंसी फूल रही थी मानो कलेजा बाहर आ जाए।
मुझे नही पता ऐसी चढ़ाई कब चढ़ी थी। मेरे बैग को नेगी जी लेके जा रहे थे। क्योंकि मेरी हालत चलने की नही हो रही थी
भारी बारिश खड़ी चढ़ाई वो भी सीढ़ियों नुमा साथ ही घने जंगलो के बीच धुप्प अँधेरा शरीर को इतना कमज़ोर होते हुए कभी नही देखा। पुरे 5 घण्टे सफर के बाद मौली खरक पहुचें।
रात 10 बजे हमे पता नही था कि ठिकाना मिले या नही लेकिन हमारे पहुँचते ही उन्होंने बुला कर अंदर बिठाया सच कहूँ तो ये सब मेरे पहाड़ में ही मुमकिन है।
थकान इतनी थी कि कदम खड़े रहने की स्तिथि में भी नही थे बारिश अभी भी लगी हुई थी सीधे ढेरे में घुसे जल्दी से रैनकोट और गीले कपड़े उतारे सूखे कपड़े पहने फिर बिस्तर पर लेटकर गर्म चाय की चुस्की ली।
कुछ समय बाद गर्मा-गर्म रोटी और दाल खाने को मिला। हमारे साथ इस बसावट में दो ग्रुप के आठ लोग और भी थे जो यहां आज रात ठहरने वाले थे।
सोने लगे तो कुछ गद्दे नीचे बिछाये और कुछ रजाई-कम्बल ऊपर ओढे। कौन सा आज ओढने-बिछाने की कुछ कमी थी?
रात बाहर खट-खट जैसी आवाजें आने लगीं। दुकान वाला उठा। उससे पूछा तो बताया कि बाहर बारहसिंहे हैं। वैसे इतनी चढ़ाई पर मुझे साँस की समस्या होने लगती है खासकर रात में मुझे रात में सोने में थोड़ी तकलीफ हुई।
आगे का सफर जारी रहेगा----

Friday, June 29, 2018

**कुछ यूँही जो यादों में है...**

"""आज यादों के झरोंखे से कुछ कहने का मन है"" सुनिये तो जरा~~~~~~~
     हम  पहाड़ के देहाती बच्चे थे । प्राथमिक स्कूल की शुरुवात घर से ही तख्ती (पाटी) लेकर स्कूल जाना स्लेट को थूक, अपने कपड़ों या हाथ से लिखा हुआ मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी । बांस की पतली कलम से सफ़ेद मिटटी को पानी में घोल कर कलम से उसका इस्तेमाल स्याही की तरह करते थे ।
   तख्ती  को  पोतना,दवात के तलवे से घोटा लगाना, अगले दिन की  तैयारी होती थी तख्ती को एक विशेस घास (कुणजू, कंदूरी के पत्ते इत्यादि)  से बड़ी तन्मयता से घोटा जाता था। और कभी हफ्ते में उल्टे तवे की कालिख को तख्ती (पाठी) पर लगाकर, इसी कालिख में हमारे हाथ, गाल, नाक आदि भी रंगीन हो जाया करते थे, पर लगन इतनी कि बाद में तख्ती  विशेष चमक  हमारे चेहरों पर भी एक खास चमक ले आती थी, मानो हम अब पूरी तरह से तैयार है। किताबी ज्ञान के अतिरिक्त, हाथ की लिखावट का भी अपना एक महत्व था।
पांचवी तक आते आते, तख्ती का स्थान कॉपियों ने, कलम का स्थान आधुनिक(होल्डर) ने एवम् मिटटी की स्याही का स्थान भी रासायनिक आधुनिक नीली स्याही ने ले लिया था ।
लेकिन निब वाले पैन अथवा बॉलपैन से अभी भी कोशो दूर थे। बल्कि बॉल पैन का उपयोग करना गुरुजनों की दृष्टि में जघन्य अपराध था, इसका अपराध बोध वे समय समय पर हमें करवाते रहते भी थे।

मास्टरजी की लिए चाय बनाना या उनका निजी काम करना, अपने आप में सर्वश्रेस्ठ कार्य माना जाता था, सर्वश्रेस्ठ विधार्थी  का तमगा जो मिल जाता था। इसके लिए किसी लिखित सर्टिफिकेट की आवस्यकता भी नहीं थी, मास्टर जी के बोल ही आवश्यक थे।

अक्सर स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में, घर से बेकार कपडा  या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जातें थे और गुरुजनों के उपयोग के लिए हर एक विद्यार्थी घर से एक जलावन की लकड़ी लेकर जाता था। आसमानी नीली और खाकी पेंट में जब पहली दफा बड़े स्कूल में कदम रखा तो बड़े होने के अहसास के साथ-साथ एक गूढ़ अनजान डर भी था ।जो करीब कुछ महीनो तक रहता ।

कक्षा  छः में पहली दफा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार A, B,C, D भी देखी। कैपिटल लैटर तो ठीक थे किंतु स्मॉल लेटर में बढ़िया एफ या जे बनाना हमें बाद  तक भी न आया था। करसीव राइटिंग तो आज तक न सीख पाए । और अंग्रेजी से मुक्ति की अभिलाषा तो यूँ थी मानों आज़ादी के मतवालों की अंग्रेजों से मुक्ति पाने की हो। पर बीच बीच मे अंग्रेजी के गुरुजी किसी जनरल डायर की तरह अत्यचार करके हमारी अंग्रेजी से मुक्ति की अभिलाषा का दमन कर ही देते थे।

हम पहाड़ी बच्चों की अपनी एक अलग ही मस्त दुनिया थी।
स्वयं से सिले कपड़े के बस्ते (bag) में किताब और कापियां लगाने का हमारा विन्यास अधिकतम रचनात्मक कौशल की श्रेणी में आता था, इतना कि विद्यार्थियों के बीच चर्चा का विषय भी होता।
नई क्लास के लिए किताबो का स्वयं से प्रबंध अपने सीनियर भाई बहनों एवम् जान पहचान वालों से करना, अपने आप में महभारत  की कूटनीति (Diplomacy) होती थी। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब उन पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव होता था। और गर्मियों की छुटियों में पुरानी किताबो की उपलब्धता के लिए पूरे महीने चर्चा करते थे, फटी हुई पुरानी किताबों को गेंहूँ के आटे को घोलकर बनाई गई लोई (gum) से चिपकाते और उस पर सुंदर लेखन से अपना नाम लिखने में जो आनंद प्राप्त होता आज किसी अन्य कार्य से प्राप्त सुख से तोला नहीं जा सकता।

गाँव से रोज़ सुबह कतार बना कर चलना,दूर दाराज के बच्चो को  पगडंडियों में एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा में चलते देखना और प्रार्थना से पहले स्कूल पहुंचना,अपने आप में एक सुखद, कसमकस और अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी।
स्कूल में पिटते, मुर्गा बनतें मगर हमारा अहम (Ego) हमें कभी परेशान न करता था, हम देहात  के बच्चे शायद तब तक जानते भी नही थे कि ego होता क्या है।

क्लास की पिटाई का रंज और गम अगले ही घंटे में काफूर हो  जाता था और हम फिर से अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते और खेलते पाए जाते। आज बच्चो को डांट देने मात्र से कैसे बच्चे मानसिक दबाव में आ जाते होंगे, इसका अंदाज़ लगाना एक देहाती के लिए थोड़ा मुश्किल होगा।

रोज़ सुबह प्रार्थना के समय पी०टी० (फिजिकल ट्रेनिंग) के दौरान एक हाथ फांसला लेना मगर फिर भी धक्का मुक्की में अड़ते भिड़ते,सावधान-विश्राम करते रहना भी अपने आप मे एक कला थी।
स्कूल हाफ टाइम में सब अपने अपने रुचिनुसार आनंदित होते कोई खेलते हुए ,कोई गप्पे मारते एवम् अगले घंटे के विषय एवम् टीचर पर चर्चा करते हुए, कुछ लोकल  मार्किट  में  चाय या पाकीजा (एक बिस्किट विशेष ब्रांड) खाते  या कुछ दबंग आसपास किसी दरख़्त , झाड़ी या स्कूल के  के पीछे बीड़ी या तम्बाकू (प्रिंस गुटखा या हाथीगोला खैनी) का आदानप्रदान करते करते थे। 

छुट्टी  की  घंटी बजती ही मानो थके हारे शरीर  में 400 वोल्ट का करंट कुलाचे मारता था और चेहरे पे एक अनुपम लालिमा आ जाती थी । घर की तरफ बढ़ने की गति सुबह की आने  की  गति से कई गुना बढ़ जाती थी। घर जाके घर के बासी खाने में या अल्प खाने  में वो स्वाद और तृप्तत्ता आती जो आज तक  कोई  5 स्टार होटल नहीं दे पाया । 

कमाल का बचपन था वो । गाव में नदी/गदेरो/पोखरों में जमे पानी में 20-25 बच्चे  एक साथ नहाते दिन में कई बार बड़ी बड़ी चट्टानों और रेत में धुप लेना , पेड़ों पर चढ़कर पसीने से सराबोर  होके  फिर  से डुबकी मारना यह सतत प्रक्रिया पूरे दिन चलती रहती।
लेकिन, मजे की बात यह थी कि हमें कभी एलर्जी या अन्य तबियत ख़राब नही होती थी। कमाल का  पहाड़ी शरीर था  साहब ! डॉक्टर तो शायद वर्षो में दिखते थे और वो भी देहाती ही होते थे ।

लड़कियों का एक बहुत प्रमुख खेल पिड्डू जिसमे जमीन पर लाइन खीचकर एक गोल पत्थर को एक पैर से लात मारकर हर खाने में बिना लाइन को छुए आगे बढ़ाना होता था, एक सांस मे बित्ती-बित्ती,बित्ती-बित्ती-बिता बोलना और अंतिम  step में आँख बंद करके आगे बढकर अलमा रैट (जिसका वास्तविक अर्थ होता था am I right) बोलकर साथी से जमीन पर बनी रेखाओं से बचकर निकलने की दिशा लेना होता था।
खेल भी ऐसे जिनमे बिना अंपायर के बत्ती कसम/विद्या कसम के सत्यापन से ही खेल की हार जीत का निर्णय चलता था। और लड़को का खेल तो कंचे , क्रिकेट ,पिट्ठू , छुपन छुपाई आदि।

और हाँ रात को चैन कहाँ, रात्रि  में  कखड़ी, मुंगरी, लीची, आम आदि  ऋतुनुसार फल  चुराना हम देहाती बच्चों का खेलो में शामिल  होता था ।

अच्छा हमारी एकता भी बड़ी अटूट होती थी, हम अपने ही घर की ककड़ी या फल दोस्तों के साथ चुराकर फिर  चुपके से सब मिलजुल के खाते और दूसरे दिन बड़ी सतर्कता से घरवालो के साथ चोरी की तफ्तीश् में जुट जाने का अबोध स्वांग भी करते  । अति विशिष्ट सुखद अनुभव देती थी वो वो छोटी छोटी फलों की चोरियां । और कमाल के बुजुर्ग थे वो जो सिर्फ गालियों तक ही इन चोरियों की रिपोर्ट लिखते थे। पटवारी, पुलिस का उनके जीवन मे कोई महत्व था भी नहीं।

हम देहात के बच्चों का सपनें देखने का सलीका भी अलग है। हम कभी नहीं सिख पाते अपने प्यार का इज़हार करना, माँ-बाप, पत्नी आदि को कभी नहीं शब्दो मे बता पाते कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं।

हम देहाती बच्चें गिरतें सम्भलतें,  लड़ते-भिड़ते ही नई दुनिया का हिस्सा बन पाते  है। कुछ मंजिल पा जाते है, कुछ यूं ही खो जाते है।  एकलव्य होना हमारी नियति है शायद। हम देहाती बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन नहीं होती पर हर ब्लैक एंड व्हाइट में भी रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं।

पढ़ाई फिर नौकरी के सिलसिलें में लाख शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच  जीवनपर्यन्त हमारा पीछा करते रहते है, नही छोड़ पाते है सुड़क-सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना, बिना रुमाल के ही बड़ी पार्टियों में शामिल होना। अनजान जगह पर भी संकोच में रास्ता न पूछना या फिर अगर एक से पूछ लिया तो उससे ही पूरा विस्तार से पूछना कि रास्ता बताने वाला असहज़ सा महसूस करने लगें।
नहीं सिख पाते कपड़ो की सिलवट से बचाए रखना और  रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना। ये सब कुछ हमें नही आता है।
अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख़्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जाने कहाँ से अचानक जुटा लाते है आत्मविश्वास।

हम पहाड़  से निकलें बच्चे, थोड़े अलग नही बल्कि पूरी तरह अलग होते है। अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा सबके साथ पाते है । हम बड़े शहरों के लोगों के साथ उठ-बैठ कर घुलमिल तो जाते है किंतु जीवन अपना ही जीते है।

अंदर से एक पहाड़ी बचपन और वो सुनहरी निस्वार्थ सोच, प्रेम, हमें अंदर से भी ता-उम्र हमें एक पहाड़ी बनाये रखती है ।
मुझे गर्व है वो ठेठ पहाड़ी अभी भी मेरे अंदर जीवित है और मेरी  सार्थक पहचान और परिचय भी है।।।।।। थोड़ा  प्रासंगिक थोड़ा अप्रासंगिक|

Wednesday, June 20, 2018

आछरियों के मुल्क में - (काल्पनिक कहानी)

आज भिलंगना घाटी में
(थौलधार ) विवाह समारोह  में आना हुआ । ।

सामने जो ऊंची चोटी दिख रही है ,वह है खैट पर्वत (समुद्रतल से ऊंचाई - लगभग दस हजार फीट )। इस क्षेत्र को आछरियों का मुल्क भी कहा जाता है।  9 आछरियाँ रहती हैं इस मुल्क में (गढ़वाल में विभिन्न क्षेत्रों को आज भी मुल्क ही कहा जाता है )।


आछरी माने परी -तिलिस्मी कन्या या अप्सरा  , इन्हें वन देवी भी माना जाता है । मान्यता है कि अगर कोई सुदर्शन युवक इस क्षेत्र में जाता था ,और वो आछरियों को पसंद आ जाता था तो आछरियाँ उसका हरण कर लेती थी और फिर वह युवक उनके मोहपाश में बंध कभी वापिस घर नहीं लौटता था।

आज खैट पर्वत की तलहटी में टहल रहा था तो एकाएक आछरियों से मुलाकात हो गयी ।  लोक मान्यताओं के अनुसार चपल -चंचल -चितभावन न दिख  कर कुछ उदास -अनमनी -असहज सी दिख रहीं थी सब । मैंने उदासी का कारण पूछा तो उनकी आंखों में छाए उदासी के बादल बरस पड़े ।

बहुत जोर देने के बाद आछरियों ने कहा जब हम पर यह इल्जाम लगा करता था कि हम युवाओं का हरण कर लेती हैं ,तब उस वक्त इस क्षेत्र के गांवों में जीवन की रौनक रहा करती थी । धन -धान्य -फलों -फूलों से भरपूर । घाटी में बहने वाली भिलंगना नदी की तरह यहां भी जीवन कल -कल कर बहता था । साल दो साल में कभी कोई युवक हमारा हो अपना घर भूल भी जाता था तो भी गांव युवाओं के गीत-संगीत- नृत्य से खिलखिलाता रहता था ।

पर अब तो दिल्ली -देहरादून -मुम्बई में बैठी विकास की आछरियों ने सब बदल दिया है । जो गया वहीं का हो गया । घाटी में भिलंगना का मुक्त प्रवाह जब से रुका ,पर्वतों -वनों में जीवन का प्रवाह थम सा गया है । अब हम कितना ही मोहने की कोशिश करें किसी को , वो हमारी लाख कोशिशों  के बावजूद विकास की आछरियों के मोहपाश में बंध चला जाता है । पहले गांवों में विद्युत ऊर्जा न थी पर जीवन ऊर्जा भरपूर थी ,अब बिजली तो है पर बेजान है , जीवन ऊर्जा लुप्त हो गयी ।

ऐसा कह आछरियाँ जाने लगीं तो मैंने कहा अगर बुरा न मानों तो एक सेल्फी हो जाय तुम्हारे साथ । आजकल आधुनिकता का प्रचलन है कि किसी का दुख हो या शोक , सेल्फी जरूर खींचनी चाहिए ।

एक सेल्फी उदास आछरियों के साथ खींची ,और कभी बिजली की चपलता से चलने वाली आछरियाँ भारी कदमों का बोझ लिए धीरे धीरे वीरान निर्जीव जंगल की तरफ चली गईं ।
#पलायन एक समस्या

Monday, June 11, 2018

"जागृत महादेव"

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 केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विश्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।

बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।👇

Tuesday, May 29, 2018

""""माँ और बेटी""

माँ और बेटी एक खुला खत :"""""

प्रिय मम्मी,
8 GB की PEN DRIVE मेँ, थोडी सी जगह कम पड गई. नही तो, मेरा पुरा बचपन एक FOLDER मेँ डालकर, यहा ससुराल लेकर आ जाती. लेकिन, मेरा बचपन तो तेरी गोद मेँ ही रह गया. तेरी गोद मेँ, मै सर रखकर सो जाती थी,
वो समय सोने(GOLD) का था. और इसिलिए वो चोरी हो गया. सोने की चीजो को तो मैँ पहले से ही संभाल ही पाती थी. कही भी खो जाती थी.
घर पर थी तब,तु मुझे ढुँढ लेती थी. लेकिन अब ससुराल आने के बाद, खुद को भी नही ढुँढ पाती, तो दुसरी चीजे कहा से मिलेगी ?


तु रोज सुबह , मेरे सर पर हाथ फेरकर उठाती थी. अब तो मुझे, ALARM रखना पडता है. जो साडी तु पहनती थी, वही साडी अब ALARM को पहनाती हु.
लेकिन फिर पता नही कि ? ALARM इतने प्रेम नही उठा सकती.
यह तेरी साडी का नही, ALARM का PROBLEM है आज भी रोना आता है,
तब तेरी पुरानी साडी का पल्लु आँसुओ के सामने रख देती हु.
आँसुओ को तो मुर्ख बना देती हु, लेकिनआँखो को कैसे बनाऊ ?
आँखे भी अब, INTELLIGENT हो गई है. तुने मुझे TRAIN की, इसी तरह,
मेरी आँखो को भी तुने ही TRAIN की है. इसिलिए मेरी आँखे,फिलहाल रोती नही. मम्मी, जब भी मैँ VEHICLE चलाती हु, तब पीछे बैठकर अब कोई नही कहता कि ‘धीरे चला ’. ‘धीरे चला ’ ऐसा कहने वाला अब कोई नही, इसिलिए ‘फास्ट’ चलाने की मजा नही आती. मम्मी, मेरे घर से ससुराल तक रास्ते मेँ,
एक भी U-TURN आया नही. नही तो, मैँ तुझे लेने के लिए आती. शादी के बाद घर से ससुराल जाते समय, जिस गाडी मेँ बैठकर मैने विदाई ली थी, उस गाडी के ‘REAR-VIEW MIRROR’ मैँलिखा था कि ‘ OBJECTS IN THE MIRROR ARE CLOSER THAN THEY APPEAR’.
बस, उसी काँच मेँ तुझे एक टक देखा था. तब, मुझे मालुम नही था कि जो रास्ता मुझे घर से ससुराल लेकर जा रहा है, वही रास्ता मुझे ससुराल से घर ले जा पाएगा ? मम्मी, कितने रास्ते ONE-WAY होते है. ऐसे रास्ते पर मैँ बहुत आगे निकल चुकी हु. किसी को मेरा पता पुछने का कोई अर्थ नही क्योकि
मेरा SURNAME और पता, दोनो बदल गये है.
लेकिन इन रास्तो के ऊपर WRONG SIDE मेँ भी DRIVE करके,
तुझसे मिलने पक्का आँउगी. क्योकिँ , मेरा DESTINATION तो तु ही है ,
जहा से मेरी जिंदगी की JOURNEY शुरूआत की थी.
मम्मी, मेरा DESTINATION और मेरी DESTINY दोनो तु ही तो है .
मै बचपन से ही मेरी दुनिया का स्पेलिग ‘UWORLDU’ लिखती हु. क्योकिँ MY WORLD STARTS WITH YOU AND ENDS IN YOU.
मम्मी, ससुराल आने के बाद भी मेरी दुनिया नही बदली. क्योकिँ, मेरी दुनिया तो तु है.
प्यारी मम्मी की बेटी
( एक बेटी एक लडके जेसा सोच सकती है तो एक बेटा एक बेटी जैसा क्यु नही सोचता?)

समर्पण ""डाल्यों का दगड़ी""




आज खुद भी सोचता हूँ कि मेरे पूर्वजोँ की दी हुई धरोहरों या प्राकृति प्रेम को हम लोग कितना निभा पायें है।

आज भी पीपल के पेड़ को काटते हम लोग इसलिए नही है क्योंकि इसमें देवताओं का वास् होता है ये मेरे बुजुर्गो ने हमे कहा है, लेकिन जब किताबे पढ़ी तो समझ आया कि पीपल इसलिये भी पवित्र है क्योंकि ये हमे दिन और रात ऑक्सिजन प्रदान करता है मेरे बुजुर्गो में पर्यावरण के प्रति कितना प्रेम था जो जीवन दायन है उसे देवताओं की श्रेणी में स्थान प्रदान कर दिया।
वैसे जिंदगी की भागदौड़ में कई लोग अपने समाज के लिए या यूँ कहूँ कि अपने आने वाल कल भविष्य के प्रति कितने सजक होते है ।
गाँव-गळी तक की पगडँड़ियो तक वो अपनी छाप छोड़ जाते है, मैंने अपनों बुजुर्गो से सुना है कि (फलाँ डालियों का आम जू तुम खाना छा रे वू फलड़ा बे बूबों कू लगायूँ ची रे) आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ लोग यूँ ही अपने अच्छे कर्मो की छाप छोड़ जा रहे है।
उन महान वव्यक्तित्व के धनी लोगो के लिए ये महान ऋषि जी की कितनी सटीक कहानी सुनाई गयी है हमे मेरे बुजुर्गो द्वारा,, आज आपके साथ साझा कर रहूँ


ऋषि युग के समय एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे, उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे। वर्षो से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने-अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज़ आवाज सबके कानों में पड़ी,"आप सभी मैदान में एकत्र हो जाएं। "आदेश सुनते शिष्यों ने ऐसा किया।

ऋषिवर बोले प्रिय शिष्यों आज आपका अंतिम दिन है. मै चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें. यह एक बाधा दौड़ होगी इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आख़िरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से गुजरना पड़ेगा "तो आप लोग तैयार है "? हाँ, हम तैयार है", शिष्य एक स्वर में बोले दौड़ शुरू हुई सभी तेज़ भागने लगे, वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुचें वहाँ बहुत अँधेरा था जगह जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुबने से असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था सभी असमंजस में पड़ गए जहाँ दौड़ में सभी एक समान बर्ताव कर रहे थे वहीं अब अलग अलग बर्ताव करने लगे खैर सभी ने जैसे तैसे दौड़ खत्म की और ऋषिवर के सम्मुख एकत्रित हुए । "पुत्रों मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ जल्दी पूरी की और कुछ ने अधिक समय लिया भला ऐसा क्यों ?"" ऋषिवर ने प्रश्न किया।
एक शिष्य बोला, "गुरु जी हम सभी साथ साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुँचते ही स्तिथि बदल गयी..कोई दूसरे को धक्का देने में आगे निकल रहा हुआ था तो कोई संभल-संभल के आगे बढ़ रहा था... कोई तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा उठा कर जेब में रख रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगो को पीड़ा ना सहनी पड़ें इसलिए सबने अलग अलग दौड़ पूरी की  """"ठीक है जिन लोगो ने पत्थर उठायें है वो आगे आये और वो पत्थर मुझे दिखाएँ ....."" ऋषिवर ने आदेश दिया आदेश सुनते ही कुछ शिष्य आगे आये और पत्थर निकलने लगे पर ये क्या जिन्हें वे पत्थर समझ रहे थे वो तो बहुमूल्य हीरे थे ।
सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .."" मैं जानता हूँ कि कि इन हीरों को देखकर आप लोग आश्चर्य में पड़ गए है.."" ऋषिवर बोले।" दरअसल इन्हें मैंने ही सुरंग में डाला था, और यह दूसरों के विषय में सोचने वाले शिष्यों को मेरा इनाम है। पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम-भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ ना कुछ पाने के लिए भाग रहा है. पर अंत में वही सबसे समृद् होता है जो इस भागम-भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चुकता है अतः यहाँ से जाते जाते इस बात को गांठ बांध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना  कभी ना भूले, अतः वही आपकी सबसे अनमोल जमाँ पूँजी होगी।
इसलिए आप खुश रहे क्योंकि आप सन्तुष्ट रहे।
"""पुनः पर्यावण दिवस के अवसर पर एक पेड़ तो आप सबकी तरफ से एक प्राकृति के लिए एक उपहार तो बनता है"" घर का आँगन आप "नीम के पेड़" से भी गुलज़ार कर सकते है जो ऑक्सिजन ही देता है दिन हो या रात"""

Sunday, May 27, 2018

रंगरुटी "पहाड़ी" मेरा जीवन-1

""चल रे उठ जा जल्दी उठ"









पिता जी के शब्द जो उस समय किसी 'बाण' तीर से कम नही लगते थे लगता था, कि जैसे वो सेना की ट्रेनिंग वाले हवलदार और मै वो रंगरुटी सिपाही सुबह की 4 बजे नही कि ट्रेनिंग शुरू।
वैसे फौजी ये ट्रेनिंग देश की रक्षा के लिए करते है और मै अपने जीवन यापन के लिए जहाँ जब मेहनत करूँगा तब ही तो अन्न की उपज करके अपने घर ला पाउँगा(फौजी की तुलना में मै स्वार्थी रंगरूटी)।
जी हा ये सुबह-सुबह की ट्रेनिंग का सार मेरे सुबह उठ कर खेतो में हल जोतने से शुरू होती थी ।
अब पिता जी तो उठ के बैल (बल्द) को घास और पानी देकर खुद चाय की चुस्की ले चुके होते, अब मेरे पास उठ कर कुछ चंद मिनट (कुछ टैम) चाय पीने को मिल जाती थी कभी कभी। जब तक मेरी चाय खत्म होती है पिता जी बैलों को लेके गली (गौला) पहुँच चुके होते थे, उफ्फ्फ यही से दौड़ शुरू (जो अक्सर बाबा रामदेव जी अपने आसन में करते है पैरों की कसरत) रास्ते में मेरे जैसे नींद में चलते हुए कई रंगरूट और मेरे पिता जी हवलदार जी की तरह अन्य पहाड़ी हवलदार जी भी मिल जाते थे बस मन ही मन खुद को तसल्ली देता था की इस रंगरूट में मै अकेला नही हूँ (सकून मिल जाता था) खेत पहुँचे तो सबसे पहले शुरुआत पिता जी ही करते थे (खेत के मेंडा निकलना) क्योंकि रँगरुटो को हवलदार जी खुद शुरुआत करके ही तो बताते है की शुरुआत कैसे और कब कहाँ करनी है (वैसे मै गुस्से में कभी-कभी दूसरों के खेत के किनारे तोड़ ही देता था)। 
फिर सूरज की उजली हुई किरणे उन सुनहरी प्रभात की बेला पर जब अपना प्रकाश फैलाती थी तो हर्ष की जो अनुभूति मिलती थी आज उसको कैसे बयाँ करू बस यूँ समझ लीजिये कि आज भी एक अह्सास करके मन हर्षित हो जाता है।
खेतों की हर एक जोत को जोतते हुई थकान मिटती हुई तब लगती थी जब दूर से माँ खाना (सुबह का नाश्ता) लाती हुई दिखती थी, सरपट (काली दाल की सतपोड़ी का साग और रोटी) उसे खा के जो मज़ा खेतों में आता था वो आज के स्टार होटल में भी नही है।
फिर वही से सरपट घर दौड़ के घर जाना और जल्दी कपड़े पहन के तैयार होना और फिर स्कूल की तरफ 2.5किमी दौड़ लगाना (जिसे आजकल शारीरिक रूप से स्वस्त व्यक्ति के लिए आवश्यक माना गया है) वैसे विद्यालय में भी अध्यापक हवलदार जी जो कि हमारे उज्ज्वल भविष्य की राह बनाते है एक रंगरूट की परीक्षा के लिए तैयार होते थे।
उस समय बिना लँच बॉक्स के  विद्यालय जाते थे तो फिर शाम को वही 2.5किमी की दौड़ घर की तरफ।
 लेकिन इस बार ये दौड़ कहीं रुकती ठहरती हुई आगे बढ़ती थी क्योंकि रास्ते में अनेक फलों (करोंदा-तुंग के बीज- बेर- जिनको खिला-खिला कर रामदेव जी पतंजलि को घर घर पंहुचा रहे है) का सेवन जो होता था।



घर पहुँचे खाना (झंगोरा और फांड़ू) खाया तब तक हवलदार साहब फिर पलटन परेड के लिए सामने खड़े उफ्फ्फ सीधे पानी के लिए बर्तन लिया और चल पड़े पानी लिए प्राकृतिक श्रोत (धारा) में जो घर से 500 मीटर की दुरी पर था उसके हमें कम से कम 5 चक्कर तो लगाने ही पड़ते थे। (2500)मीटर मतलब 2.5किमी।
अब थोडा खेलने का समय मिला वो भी अँधेरी होती रात जल्दी ही छीन लेती थी। जल श्रोत(पानी का धारा) की तरफ नहाने जाने की तैयारी में भी माँ की एक पुकार तैयार होती थी (जब जाणी ही छे ता एक भांडू पाणी लै जै) जब शहर में 46 डिग्री तापमान होता था तब हम अपने प्राकृतिक जल श्रोतो से ठंडे ठंडे पानी से नहाकर अपने आप को तरोताज़ा करते थे (वैसे शहरों की तरह यहाँ पानी पर कोई शुल्क नही होता था)
घर पहुँचें फिर हवलदार साहब हमारी राह में बैठे रहते(पौडं नी तिन बस खेन ही चेणु ये तै) अब हवलदार साहब एक पहरेदार की भूमिका उनकी पैनी नज़र हमारी तरफ(तब फ़ोन भी नही थे) बस पढ़ते समय कभी कभी ख्यालो में खोकर हम थोडा समय निकाल लेते थे।
खाना खाने के बाद घर के आँगन में चारपाई (खाट) लगाके तारों को गिनना और जैसे हमें बताया गया था कि चाँद और तारों को देखकर प्रणाम करके उससे कुछ मांगो तो वो हमे मिल जाता है, प्रणाम करना और कुछ (सरकारी नॉकरी) माँगना।
फिर तारों को गिनते-गिनते कब आँख लग गयी पता ही नही चलता था।
ऐसी ही होती थी एक पहाड़ पर रहने वाले रंगरूटी पहाड़ी की जिंदगी। जहां पल-पल वो अनेक साहसिक खेलो से भी वो रूबरू होता है।
और उस हवलदार रूपी पिता से जो हमे जीवन के अनेक सुख-दुःखो से सींचते है। उनकी हर एक डांट और गुस्से में हमारे जीवन की हर एक गलतियां की सुधार छुपी होती है 
वो कहते है ना जीवन में पिता वो ढाल है जो आपको जीवन के हर वो सार के महत्व को समझाते है जो जीवन के संघर्षो में आपके काम आता है।

(आज भी मेरे बुजर्गो को लम्बे और स्वस्थ जीवन का सार यही पहाड़ी जीवनशैली रही है जो हमारे जैसे अनेक लोग अब खो रहे है या खो चुके है) -देवेन्द्र पंवार


Saturday, May 26, 2018

उम्मीदों का """रिजल्ट"""










रिजल्ट .....

रिजल्ट तो हमारे जमाने मे आता था 10 दिन पहले हवा फैल जाती थी हर रात को बोला जाता था कि आज रिजल्ट है और अखबार वाला रात 12 बजे के बाद कभी भी आ सकता है

पहले 2 दिन तो आता नहीं था लेकिन जिस दिन आता था हाहाकार मच जाती थी , रोल नंबर ढूंढते ढूंढते कई सदियों का सफर बीत जाता था , कोई कंट्रोल एफ का फंक्शन तो था नही की फट से सर्च करो और मिल जाये

बेचारा अखबार वाला कोयले की खदान के मजदूर से भी ज्यादा मेहनत करता था कालेज के नाम को और रोल नंबर को ढूंढने में

जब कोई पास हो जाये तो खड़क से अखबार वाले के मुँह पर भी इतनी खुशी आ जाती थी कि चलो कुआं खोदने में समय तो लगा पर पानी आखिर मिल ही गया

जिसका रिजल्ट बस पास होता दिख जाए तो क्या खुशी जैसे कि गर्ल फ़्रेंड के साथ शादी होने पर होती है कि माता रानी ने मुराद पूरी कर दिया

उस समय पर सब निर्मोही हुआ करते थे कोई ये नही देखता था कि कौन सी डिवीजन से पास हुआ है, क्योंकि बस पास ही हो जाये कोई तो पूरे मुहल्ले और दूर दूर के गाँवो में खबर ऐसे फैलती थी कि जैसे आजकल जंगलों में लगी हुई आग फैलती है

अखबार में सिर्फ F प्रथम श्रेणी S द्वितीय श्रेणी और T तृतीय श्रेणी लिखा होता था बाकी सब गायब जैसी की मिस्टर इंडिया का अनिल कपूर बैठा हो और फेल होने वाले का रोल नंबर गायब कर दिया हो

उस पुरा पाषाण युग मे बस ऊपर लिखा हुआ कुछ दिख जाए तो रात को ही भांगड़ा शुरू हो जाता था उस समय डांस ऐसा होता था कि साक्षात माइकल जैक्सन की आत्मा घुस पड़ी हो बस शकीरा भी साथ मे होती तो मैं भी नाच लेता

जिस किसी का रोल नम्बर नही दिखता उसे बोला जाता था भाई कोई नही अगली बार मेहनत करना परंतु अखबार वाला जो रिजल्ट दिखाता है  वो मन ही मन इतनी गाली देता था कि मानो गर्लफ्रेण्ड के पिताजी ने शादी को मना किया हो तो मन के अंदर तो गालियां है परंतु बाहर से सांत्वना दे रहा हो

और सबसे बड़ा झटका तो उन्हें पड़ता था जहाँ पूरे पूरे स्कूल गांव अखबार से गायब ऐसे हुआ करते थे जैसे गब्बर सिंह जंगल से गांव आ रहा हो और गांव वाले गायब हो जाया करते थे ...

"Pahado ki ek 'Amar-Prem Gatha'















हिमालय का सौन्‍दर्य जितना आकर्षक है उतनी ही सुन्‍दर प्रेम कहानियां यहां की लोक कथाओं और गीतों में दिखाई देती हैं। उत्‍तराखंड के विभिन्‍न हिस्‍सों में प्रेम कहानियां लोकगथाओं के रूप में जन जन तक पहुंची हैं, हालांकि यह अधिकतर राजघरानों से जुड़ी हैं लेकिन वह आम आदमी तक प्‍यार का संदेश छोड्ने में कामयाब रही हैं, हरूहीत और जगदेच पंवार की कहानी तो है ही रामी बौराणी का अपने पति के इंतजार में सालों गुजारना उसके समर्पण को दर्शाता है, इन सबसे बढ्कर राजुला मालुशाही की अमर प्रेम कथा है जो प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। उत्‍तराखण्‍ड की लोककथाओं में प्रेम कथाओं का विशेष महत्‍व हें यह लोक गाथाओं के रूप में गाई जाती है, हालांकि अलग अलग हिस्‍सों में इन कहानियों को अपनी तरह से लोक गायकों ने प्रस्‍तुत किया है लेकिन जब समग्रता से इसे देखते हैं तो कुछ कहानियां ऐसी हैं जिन्‍होंने उन पात्रों को आज भी गांवों में जीवंत रखा है। यहां प्रचलित कहानियों की पृष्‍ठभूमि में विषम भौगोलिक परिस्थितियों से उपजी दिक्क्तें साफ झलकती हैं। राजुला मालुशाही की गाथा कितनी अमर है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है साइबर युग में जहां प्रेम की बात संचार माध्‍मों से हो रही हो वहां भोट की राजुला का वैराट, चौखुटिया आने और मालूशाही का भोट की कठिन यात्रा प्रेमियों का आदर्श है।

कुमाऊं और गढ्वाल में प्रेम गाथायें झोड़ा, चांचरी, भगनौले और अन्‍य लोक गीतों के माध्‍यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सुनी सुनाई जाती रही हैं, मेले इनको जीवन्‍त बनाते हैं। राजुला मालुशाही पहाड् की सबसे प्रसिद्व अमर प्रेम कहानी है। यह दो प्रेमियों के मिलन में आने वाले कष्‍टों, दो जातियों, दो देशों, दो अलग परिवेश में रहने वाले प्रेमियों की कहानी है। सामाजिक बंधनों में जकड़े समाज के सामने यह चुनौती भी थी। यहां एक तरफ बैराठ का संपन्‍न राजघराना है, वहीं दूसरी ओर एक साधारण व्‍यापारी, इन दो संस्कृतियों का मिलन आसान नहीं था। लेकिन एक प्रेमिका की चाह और प्रेमी का समर्पण पेम की एक ऐसी इबारत लिखता है जो तत्‍कालीन सामाजिक ढ्ाचे को तोड्ते हुए नया इतिहास बनाती है।

राजुला मालूशाही की जो लोकगाथा प्रचिलत है वह इस प्रकार है- कुमांऊं के पहले राजवंश कत्‍यूर के किसी वंशज को लेकर यह कहानी है, उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्‍होंने कई मनौतियां मनाई। अन्‍त में उन्‍हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्‍हें संतान की प्राप्‍ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्‍यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे।  दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड्का और लड्की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया।  समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्‍दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्‍य सबको अपनी ओर खींचता था।
पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवे दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा।”  राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया।  लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।
धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे….राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लड़की को रंगीली वैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा। एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि
मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी? पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा? देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”
उसकी मां ने उत्तर दिया दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट
तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।
वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया।  लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।”   यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।
गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके।
तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोड़कर? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने।  रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।
मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोलादे माई भिक्षा!तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ले जोगी भिक्षापर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखतातो राजुला ने कहा कि मैं सुनपति शौका की लड़की राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या हैतो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा
तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।
सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर वैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोड़्कर जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।


 कितने सरे सपने होते है किसी हम जैसे लोअर मिडिल क्लास के एक तो पहाड़ो से दूसरा शहर की आपाधापी से दूर जहां न ज्यादा गाड़ियों की आवाजे है न दिन...