Tuesday, May 29, 2018

समर्पण ""डाल्यों का दगड़ी""




आज खुद भी सोचता हूँ कि मेरे पूर्वजोँ की दी हुई धरोहरों या प्राकृति प्रेम को हम लोग कितना निभा पायें है।

आज भी पीपल के पेड़ को काटते हम लोग इसलिए नही है क्योंकि इसमें देवताओं का वास् होता है ये मेरे बुजुर्गो ने हमे कहा है, लेकिन जब किताबे पढ़ी तो समझ आया कि पीपल इसलिये भी पवित्र है क्योंकि ये हमे दिन और रात ऑक्सिजन प्रदान करता है मेरे बुजुर्गो में पर्यावरण के प्रति कितना प्रेम था जो जीवन दायन है उसे देवताओं की श्रेणी में स्थान प्रदान कर दिया।
वैसे जिंदगी की भागदौड़ में कई लोग अपने समाज के लिए या यूँ कहूँ कि अपने आने वाल कल भविष्य के प्रति कितने सजक होते है ।
गाँव-गळी तक की पगडँड़ियो तक वो अपनी छाप छोड़ जाते है, मैंने अपनों बुजुर्गो से सुना है कि (फलाँ डालियों का आम जू तुम खाना छा रे वू फलड़ा बे बूबों कू लगायूँ ची रे) आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ लोग यूँ ही अपने अच्छे कर्मो की छाप छोड़ जा रहे है।
उन महान वव्यक्तित्व के धनी लोगो के लिए ये महान ऋषि जी की कितनी सटीक कहानी सुनाई गयी है हमे मेरे बुजुर्गो द्वारा,, आज आपके साथ साझा कर रहूँ


ऋषि युग के समय एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे, उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे। वर्षो से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने-अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज़ आवाज सबके कानों में पड़ी,"आप सभी मैदान में एकत्र हो जाएं। "आदेश सुनते शिष्यों ने ऐसा किया।

ऋषिवर बोले प्रिय शिष्यों आज आपका अंतिम दिन है. मै चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें. यह एक बाधा दौड़ होगी इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आख़िरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से गुजरना पड़ेगा "तो आप लोग तैयार है "? हाँ, हम तैयार है", शिष्य एक स्वर में बोले दौड़ शुरू हुई सभी तेज़ भागने लगे, वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुचें वहाँ बहुत अँधेरा था जगह जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुबने से असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था सभी असमंजस में पड़ गए जहाँ दौड़ में सभी एक समान बर्ताव कर रहे थे वहीं अब अलग अलग बर्ताव करने लगे खैर सभी ने जैसे तैसे दौड़ खत्म की और ऋषिवर के सम्मुख एकत्रित हुए । "पुत्रों मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ जल्दी पूरी की और कुछ ने अधिक समय लिया भला ऐसा क्यों ?"" ऋषिवर ने प्रश्न किया।
एक शिष्य बोला, "गुरु जी हम सभी साथ साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुँचते ही स्तिथि बदल गयी..कोई दूसरे को धक्का देने में आगे निकल रहा हुआ था तो कोई संभल-संभल के आगे बढ़ रहा था... कोई तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा उठा कर जेब में रख रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगो को पीड़ा ना सहनी पड़ें इसलिए सबने अलग अलग दौड़ पूरी की  """"ठीक है जिन लोगो ने पत्थर उठायें है वो आगे आये और वो पत्थर मुझे दिखाएँ ....."" ऋषिवर ने आदेश दिया आदेश सुनते ही कुछ शिष्य आगे आये और पत्थर निकलने लगे पर ये क्या जिन्हें वे पत्थर समझ रहे थे वो तो बहुमूल्य हीरे थे ।
सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .."" मैं जानता हूँ कि कि इन हीरों को देखकर आप लोग आश्चर्य में पड़ गए है.."" ऋषिवर बोले।" दरअसल इन्हें मैंने ही सुरंग में डाला था, और यह दूसरों के विषय में सोचने वाले शिष्यों को मेरा इनाम है। पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम-भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ ना कुछ पाने के लिए भाग रहा है. पर अंत में वही सबसे समृद् होता है जो इस भागम-भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चुकता है अतः यहाँ से जाते जाते इस बात को गांठ बांध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना  कभी ना भूले, अतः वही आपकी सबसे अनमोल जमाँ पूँजी होगी।
इसलिए आप खुश रहे क्योंकि आप सन्तुष्ट रहे।
"""पुनः पर्यावण दिवस के अवसर पर एक पेड़ तो आप सबकी तरफ से एक प्राकृति के लिए एक उपहार तो बनता है"" घर का आँगन आप "नीम के पेड़" से भी गुलज़ार कर सकते है जो ऑक्सिजन ही देता है दिन हो या रात"""

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