Sunday, May 27, 2018

रंगरुटी "पहाड़ी" मेरा जीवन-1

""चल रे उठ जा जल्दी उठ"









पिता जी के शब्द जो उस समय किसी 'बाण' तीर से कम नही लगते थे लगता था, कि जैसे वो सेना की ट्रेनिंग वाले हवलदार और मै वो रंगरुटी सिपाही सुबह की 4 बजे नही कि ट्रेनिंग शुरू।
वैसे फौजी ये ट्रेनिंग देश की रक्षा के लिए करते है और मै अपने जीवन यापन के लिए जहाँ जब मेहनत करूँगा तब ही तो अन्न की उपज करके अपने घर ला पाउँगा(फौजी की तुलना में मै स्वार्थी रंगरूटी)।
जी हा ये सुबह-सुबह की ट्रेनिंग का सार मेरे सुबह उठ कर खेतो में हल जोतने से शुरू होती थी ।
अब पिता जी तो उठ के बैल (बल्द) को घास और पानी देकर खुद चाय की चुस्की ले चुके होते, अब मेरे पास उठ कर कुछ चंद मिनट (कुछ टैम) चाय पीने को मिल जाती थी कभी कभी। जब तक मेरी चाय खत्म होती है पिता जी बैलों को लेके गली (गौला) पहुँच चुके होते थे, उफ्फ्फ यही से दौड़ शुरू (जो अक्सर बाबा रामदेव जी अपने आसन में करते है पैरों की कसरत) रास्ते में मेरे जैसे नींद में चलते हुए कई रंगरूट और मेरे पिता जी हवलदार जी की तरह अन्य पहाड़ी हवलदार जी भी मिल जाते थे बस मन ही मन खुद को तसल्ली देता था की इस रंगरूट में मै अकेला नही हूँ (सकून मिल जाता था) खेत पहुँचे तो सबसे पहले शुरुआत पिता जी ही करते थे (खेत के मेंडा निकलना) क्योंकि रँगरुटो को हवलदार जी खुद शुरुआत करके ही तो बताते है की शुरुआत कैसे और कब कहाँ करनी है (वैसे मै गुस्से में कभी-कभी दूसरों के खेत के किनारे तोड़ ही देता था)। 
फिर सूरज की उजली हुई किरणे उन सुनहरी प्रभात की बेला पर जब अपना प्रकाश फैलाती थी तो हर्ष की जो अनुभूति मिलती थी आज उसको कैसे बयाँ करू बस यूँ समझ लीजिये कि आज भी एक अह्सास करके मन हर्षित हो जाता है।
खेतों की हर एक जोत को जोतते हुई थकान मिटती हुई तब लगती थी जब दूर से माँ खाना (सुबह का नाश्ता) लाती हुई दिखती थी, सरपट (काली दाल की सतपोड़ी का साग और रोटी) उसे खा के जो मज़ा खेतों में आता था वो आज के स्टार होटल में भी नही है।
फिर वही से सरपट घर दौड़ के घर जाना और जल्दी कपड़े पहन के तैयार होना और फिर स्कूल की तरफ 2.5किमी दौड़ लगाना (जिसे आजकल शारीरिक रूप से स्वस्त व्यक्ति के लिए आवश्यक माना गया है) वैसे विद्यालय में भी अध्यापक हवलदार जी जो कि हमारे उज्ज्वल भविष्य की राह बनाते है एक रंगरूट की परीक्षा के लिए तैयार होते थे।
उस समय बिना लँच बॉक्स के  विद्यालय जाते थे तो फिर शाम को वही 2.5किमी की दौड़ घर की तरफ।
 लेकिन इस बार ये दौड़ कहीं रुकती ठहरती हुई आगे बढ़ती थी क्योंकि रास्ते में अनेक फलों (करोंदा-तुंग के बीज- बेर- जिनको खिला-खिला कर रामदेव जी पतंजलि को घर घर पंहुचा रहे है) का सेवन जो होता था।



घर पहुँचे खाना (झंगोरा और फांड़ू) खाया तब तक हवलदार साहब फिर पलटन परेड के लिए सामने खड़े उफ्फ्फ सीधे पानी के लिए बर्तन लिया और चल पड़े पानी लिए प्राकृतिक श्रोत (धारा) में जो घर से 500 मीटर की दुरी पर था उसके हमें कम से कम 5 चक्कर तो लगाने ही पड़ते थे। (2500)मीटर मतलब 2.5किमी।
अब थोडा खेलने का समय मिला वो भी अँधेरी होती रात जल्दी ही छीन लेती थी। जल श्रोत(पानी का धारा) की तरफ नहाने जाने की तैयारी में भी माँ की एक पुकार तैयार होती थी (जब जाणी ही छे ता एक भांडू पाणी लै जै) जब शहर में 46 डिग्री तापमान होता था तब हम अपने प्राकृतिक जल श्रोतो से ठंडे ठंडे पानी से नहाकर अपने आप को तरोताज़ा करते थे (वैसे शहरों की तरह यहाँ पानी पर कोई शुल्क नही होता था)
घर पहुँचें फिर हवलदार साहब हमारी राह में बैठे रहते(पौडं नी तिन बस खेन ही चेणु ये तै) अब हवलदार साहब एक पहरेदार की भूमिका उनकी पैनी नज़र हमारी तरफ(तब फ़ोन भी नही थे) बस पढ़ते समय कभी कभी ख्यालो में खोकर हम थोडा समय निकाल लेते थे।
खाना खाने के बाद घर के आँगन में चारपाई (खाट) लगाके तारों को गिनना और जैसे हमें बताया गया था कि चाँद और तारों को देखकर प्रणाम करके उससे कुछ मांगो तो वो हमे मिल जाता है, प्रणाम करना और कुछ (सरकारी नॉकरी) माँगना।
फिर तारों को गिनते-गिनते कब आँख लग गयी पता ही नही चलता था।
ऐसी ही होती थी एक पहाड़ पर रहने वाले रंगरूटी पहाड़ी की जिंदगी। जहां पल-पल वो अनेक साहसिक खेलो से भी वो रूबरू होता है।
और उस हवलदार रूपी पिता से जो हमे जीवन के अनेक सुख-दुःखो से सींचते है। उनकी हर एक डांट और गुस्से में हमारे जीवन की हर एक गलतियां की सुधार छुपी होती है 
वो कहते है ना जीवन में पिता वो ढाल है जो आपको जीवन के हर वो सार के महत्व को समझाते है जो जीवन के संघर्षो में आपके काम आता है।

(आज भी मेरे बुजर्गो को लम्बे और स्वस्थ जीवन का सार यही पहाड़ी जीवनशैली रही है जो हमारे जैसे अनेक लोग अब खो रहे है या खो चुके है) -देवेन्द्र पंवार


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