आछरियों के मुल्क में - (काल्पनिक कहानी)
आज भिलंगना घाटी में
(थौलधार ) विवाह समारोह में आना हुआ । ।
सामने जो ऊंची चोटी दिख रही है ,वह है खैट पर्वत (समुद्रतल से ऊंचाई - लगभग दस हजार फीट )। इस क्षेत्र को आछरियों का मुल्क भी कहा जाता है। 9 आछरियाँ रहती हैं इस मुल्क में (गढ़वाल में विभिन्न क्षेत्रों को आज भी मुल्क ही कहा जाता है )।
आछरी माने परी -तिलिस्मी कन्या या अप्सरा , इन्हें वन देवी भी माना जाता है । मान्यता है कि अगर कोई सुदर्शन युवक इस क्षेत्र में जाता था ,और वो आछरियों को पसंद आ जाता था तो आछरियाँ उसका हरण कर लेती थी और फिर वह युवक उनके मोहपाश में बंध कभी वापिस घर नहीं लौटता था।
आज खैट पर्वत की तलहटी में टहल रहा था तो एकाएक आछरियों से मुलाकात हो गयी । लोक मान्यताओं के अनुसार चपल -चंचल -चितभावन न दिख कर कुछ उदास -अनमनी -असहज सी दिख रहीं थी सब । मैंने उदासी का कारण पूछा तो उनकी आंखों में छाए उदासी के बादल बरस पड़े ।
बहुत जोर देने के बाद आछरियों ने कहा जब हम पर यह इल्जाम लगा करता था कि हम युवाओं का हरण कर लेती हैं ,तब उस वक्त इस क्षेत्र के गांवों में जीवन की रौनक रहा करती थी । धन -धान्य -फलों -फूलों से भरपूर । घाटी में बहने वाली भिलंगना नदी की तरह यहां भी जीवन कल -कल कर बहता था । साल दो साल में कभी कोई युवक हमारा हो अपना घर भूल भी जाता था तो भी गांव युवाओं के गीत-संगीत- नृत्य से खिलखिलाता रहता था ।
पर अब तो दिल्ली -देहरादून -मुम्बई में बैठी विकास की आछरियों ने सब बदल दिया है । जो गया वहीं का हो गया । घाटी में भिलंगना का मुक्त प्रवाह जब से रुका ,पर्वतों -वनों में जीवन का प्रवाह थम सा गया है । अब हम कितना ही मोहने की कोशिश करें किसी को , वो हमारी लाख कोशिशों के बावजूद विकास की आछरियों के मोहपाश में बंध चला जाता है । पहले गांवों में विद्युत ऊर्जा न थी पर जीवन ऊर्जा भरपूर थी ,अब बिजली तो है पर बेजान है , जीवन ऊर्जा लुप्त हो गयी ।
ऐसा कह आछरियाँ जाने लगीं तो मैंने कहा अगर बुरा न मानों तो एक सेल्फी हो जाय तुम्हारे साथ । आजकल आधुनिकता का प्रचलन है कि किसी का दुख हो या शोक , सेल्फी जरूर खींचनी चाहिए ।
एक सेल्फी उदास आछरियों के साथ खींची ,और कभी बिजली की चपलता से चलने वाली आछरियाँ भारी कदमों का बोझ लिए धीरे धीरे वीरान निर्जीव जंगल की तरफ चली गईं ।
#पलायन एक समस्या
आज भिलंगना घाटी में
(थौलधार ) विवाह समारोह में आना हुआ । ।
सामने जो ऊंची चोटी दिख रही है ,वह है खैट पर्वत (समुद्रतल से ऊंचाई - लगभग दस हजार फीट )। इस क्षेत्र को आछरियों का मुल्क भी कहा जाता है। 9 आछरियाँ रहती हैं इस मुल्क में (गढ़वाल में विभिन्न क्षेत्रों को आज भी मुल्क ही कहा जाता है )।
आछरी माने परी -तिलिस्मी कन्या या अप्सरा , इन्हें वन देवी भी माना जाता है । मान्यता है कि अगर कोई सुदर्शन युवक इस क्षेत्र में जाता था ,और वो आछरियों को पसंद आ जाता था तो आछरियाँ उसका हरण कर लेती थी और फिर वह युवक उनके मोहपाश में बंध कभी वापिस घर नहीं लौटता था।
आज खैट पर्वत की तलहटी में टहल रहा था तो एकाएक आछरियों से मुलाकात हो गयी । लोक मान्यताओं के अनुसार चपल -चंचल -चितभावन न दिख कर कुछ उदास -अनमनी -असहज सी दिख रहीं थी सब । मैंने उदासी का कारण पूछा तो उनकी आंखों में छाए उदासी के बादल बरस पड़े ।
बहुत जोर देने के बाद आछरियों ने कहा जब हम पर यह इल्जाम लगा करता था कि हम युवाओं का हरण कर लेती हैं ,तब उस वक्त इस क्षेत्र के गांवों में जीवन की रौनक रहा करती थी । धन -धान्य -फलों -फूलों से भरपूर । घाटी में बहने वाली भिलंगना नदी की तरह यहां भी जीवन कल -कल कर बहता था । साल दो साल में कभी कोई युवक हमारा हो अपना घर भूल भी जाता था तो भी गांव युवाओं के गीत-संगीत- नृत्य से खिलखिलाता रहता था ।
पर अब तो दिल्ली -देहरादून -मुम्बई में बैठी विकास की आछरियों ने सब बदल दिया है । जो गया वहीं का हो गया । घाटी में भिलंगना का मुक्त प्रवाह जब से रुका ,पर्वतों -वनों में जीवन का प्रवाह थम सा गया है । अब हम कितना ही मोहने की कोशिश करें किसी को , वो हमारी लाख कोशिशों के बावजूद विकास की आछरियों के मोहपाश में बंध चला जाता है । पहले गांवों में विद्युत ऊर्जा न थी पर जीवन ऊर्जा भरपूर थी ,अब बिजली तो है पर बेजान है , जीवन ऊर्जा लुप्त हो गयी ।
ऐसा कह आछरियाँ जाने लगीं तो मैंने कहा अगर बुरा न मानों तो एक सेल्फी हो जाय तुम्हारे साथ । आजकल आधुनिकता का प्रचलन है कि किसी का दुख हो या शोक , सेल्फी जरूर खींचनी चाहिए ।
एक सेल्फी उदास आछरियों के साथ खींची ,और कभी बिजली की चपलता से चलने वाली आछरियाँ भारी कदमों का बोझ लिए धीरे धीरे वीरान निर्जीव जंगल की तरफ चली गईं ।
#पलायन एक समस्या



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