Monday, August 6, 2018

रुद्रनाथ जी यात्रा भाग 1


पंच केदार में एक रुद्रनाथ जी के बारे में अभी तक पढ़ा और सुना ही था और हिमालय की गोद में बसा भगवान महादेव जी का यह स्थल अत्यंत दुर्गम एवं कठिन यात्रा मानी जाती है।
विगत समय से इस यात्रा को करने की मेरी प्रबल इच्छा थी क्योंकि पंच केदारों के साथ-साथ यह हिमालय की गोद में बसा है और मै खुद एक हिमालय वासी हूँ अतः निश्चय किया कि यह यात्रा की जाय वो भी सावन (सौण) के महीने में इस यात्रा में 4 जने यात्रा के लिए तैयार थे वैसे सावन के महीने में हिमालय पहाड़ो में यात्रा करना अपने आप में किसी कठिन परीक्षा से कम नही है अतः 5 अगस्त से यात्रा हमने शुरू की मेरे साथ मेरे दो जीजा जी श्री रावत जी श्री बिष्ट जी और मेरे मित्र नेगी जी भी तैयार हो गए।
सुबह 10.30 नंदप्रयाग धाट में पहुँचे ही थे भोलेनाथ ने हमारी परीक्षा शुरू कर दी पुरे 5 घण्टे सड़क पर मलबा आने से जाम में फंस गए और ऊपर से मौसम खराब साथ ही मौसम विभाग का अलर्ट की पूरे 72 घण्टे भारी बारिश और ये 72 घण्टे हमारे अब शुरू होने वाले थे वो भी पहाड़ो में।

वैसे गोपेश्वर पहुँचने पर भारी बारिश हमारा इंतजार कर रही थी। यहाँ दोपहर का खाना खाया और निकल।पड़े।
गोपेश्वर से पांच किलोमीटर आगे चलते ही सग्गर मिल गया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अरे! सग्गर तो इसी सडक पर है। हम रुके, स्थानीयों से पक्का कर लिया कि यही सग्गर है और यहीं से रुद्रनाथ का रास्ता जाता है। यहां से दस किलोमीटर आगे इसी सडक पर मण्डल है और फिर यही सडक आगे चोपता और ऊखीमठ चली जाती है।
शाम के साढ़े चार बजे थे। अभी भी दो घण्टे तक रोशनी रहेगी, इसलिये आगे बढा जा सकता है। दुकान वाले ने बताया कि यहां से चार किलोमीटर आगे पुंग बुग्याल है। वहां रुकने का इंतजाम है। उससे ढ़ाई-ढ़ाई
किलोमीटर आगे अगले ठिकाने है। रास्ता चढाई भरा है, यह तो सग्गर से दिख ही रहा था। चार किलोमीटर यानी दो घण्टे। इसका मतलब आज हम पुंग बुग्याल या उससे आगे ठिकानों में रुकेंगे। ठीक साढ़े चार बजे हम चल दिये।
आज का ज्यादातर पैदल रास्ता बसावट से होकर जाता है। चारों तरफ हरे-भरे खेत बडे अच्छे लग रहे थे। बारिश और बादलों संग हम आगे बढते गए।
इसी दौरान एक जंगली बिल्ली दिखी जो कौवे का शिकार करके भागी चली जा रही थी।
दो किलोमीटर बाद एक विश्राम शेड मिला। यहां पहुंचे तो थकान से चूर-चूर हो रहे थे, सोच थोड़ा चाय की चुस्की ले ले।
फिर यहां से पथराई चट्टानों से चढ़ाई की शुरुआत हुई जो वीरान जंगलो से होकर गुजरता है
पांच बजकर पचास मिनट पर जब पुंग बुग्याल में प्रवेश किया।

आइडिया एयरटेल वोडाफ़ोन पुंग बुग्याल में काम करते हैं।  घने जंगल से घिरा हुआ यह छोटा सा बुग्याल है। बुग्याल का अर्थ होता है घास का मैदान। ये छोटे छोटे भी होते हैं और बडे-बडे विशाल भी। विशाल बुग्याल अक्सर 3000 मीटर से 4000 मीटर के बीच में मिलते हैं जैसे दयारा, बेदिनी आदि; जबकि 3000 मीटर से कम ऊंचाई पर जंगलों में छोटे-छोटे बुग्याल मिलते हैं।

सग्गर (30°26’20.05”, 79°19’12.63”) समुद्र तल से 1670 मीटर ऊपर है जबकि पुंग बुग्याल (30°27’11.21”, 79°20’05.27”) की ऊंचाई 2255 मीटर है। यानी 4 किलोमीटर में ही 585 मीटर की ऊंचाई। निश्चित ही यह काफी तेज चढाई है।
यहां थकान भी लगी हुई थी तो चाय पिने का मन हुआ जैसे ही गरमा गरम चाय मिली मज़ा आया पता नही ऐसी चाय की आवश्यक्ता पहले कब महसूस हुई। पता नहीं देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसा होता है या नहीं लेकिन मेरे हिमालय में यही होता है। आप थके-हारे किसी लकडी और फूस की दुकान में पहुंचते हो और आपको बिना कहे चाय मिल जाये- बस यही आनन्द की पराकाष्ठा है। फिर पुंग बुग्याल जैसी जगह हो। चारों तरफ घना जंगल- भालुओं, तेंदुओं और बारहसिंहों से घिरा- और आप अँधेरे से पहले किसी लकड़ी की झोपडी में बैठे हो और आपको चाय मिल जाये। अभी हमारे पास थोडा समय था सोचा कल के लिए दुरी कुछ कम की जाय अतः हमने पुंग बुग्याल से सफर जारी करने का निर्णय लिया यहां से 5 किलोमीटर की दुरी पर मौली खरक है घने जंगलों और पानी के गाड़ गधेरों को तरते हुए खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए सांसे ऐंसी फूल रही थी मानो कलेजा बाहर आ जाए।
मुझे नही पता ऐसी चढ़ाई कब चढ़ी थी। मेरे बैग को नेगी जी लेके जा रहे थे। क्योंकि मेरी हालत चलने की नही हो रही थी
भारी बारिश खड़ी चढ़ाई वो भी सीढ़ियों नुमा साथ ही घने जंगलो के बीच धुप्प अँधेरा शरीर को इतना कमज़ोर होते हुए कभी नही देखा। पुरे 5 घण्टे सफर के बाद मौली खरक पहुचें।
रात 10 बजे हमे पता नही था कि ठिकाना मिले या नही लेकिन हमारे पहुँचते ही उन्होंने बुला कर अंदर बिठाया सच कहूँ तो ये सब मेरे पहाड़ में ही मुमकिन है।
थकान इतनी थी कि कदम खड़े रहने की स्तिथि में भी नही थे बारिश अभी भी लगी हुई थी सीधे ढेरे में घुसे जल्दी से रैनकोट और गीले कपड़े उतारे सूखे कपड़े पहने फिर बिस्तर पर लेटकर गर्म चाय की चुस्की ली।
कुछ समय बाद गर्मा-गर्म रोटी और दाल खाने को मिला। हमारे साथ इस बसावट में दो ग्रुप के आठ लोग और भी थे जो यहां आज रात ठहरने वाले थे।
सोने लगे तो कुछ गद्दे नीचे बिछाये और कुछ रजाई-कम्बल ऊपर ओढे। कौन सा आज ओढने-बिछाने की कुछ कमी थी?
रात बाहर खट-खट जैसी आवाजें आने लगीं। दुकान वाला उठा। उससे पूछा तो बताया कि बाहर बारहसिंहे हैं। वैसे इतनी चढ़ाई पर मुझे साँस की समस्या होने लगती है खासकर रात में मुझे रात में सोने में थोड़ी तकलीफ हुई।
आगे का सफर जारी रहेगा----

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