Tuesday, May 29, 2018

""""माँ और बेटी""

माँ और बेटी एक खुला खत :"""""

प्रिय मम्मी,
8 GB की PEN DRIVE मेँ, थोडी सी जगह कम पड गई. नही तो, मेरा पुरा बचपन एक FOLDER मेँ डालकर, यहा ससुराल लेकर आ जाती. लेकिन, मेरा बचपन तो तेरी गोद मेँ ही रह गया. तेरी गोद मेँ, मै सर रखकर सो जाती थी,
वो समय सोने(GOLD) का था. और इसिलिए वो चोरी हो गया. सोने की चीजो को तो मैँ पहले से ही संभाल ही पाती थी. कही भी खो जाती थी.
घर पर थी तब,तु मुझे ढुँढ लेती थी. लेकिन अब ससुराल आने के बाद, खुद को भी नही ढुँढ पाती, तो दुसरी चीजे कहा से मिलेगी ?


तु रोज सुबह , मेरे सर पर हाथ फेरकर उठाती थी. अब तो मुझे, ALARM रखना पडता है. जो साडी तु पहनती थी, वही साडी अब ALARM को पहनाती हु.
लेकिन फिर पता नही कि ? ALARM इतने प्रेम नही उठा सकती.
यह तेरी साडी का नही, ALARM का PROBLEM है आज भी रोना आता है,
तब तेरी पुरानी साडी का पल्लु आँसुओ के सामने रख देती हु.
आँसुओ को तो मुर्ख बना देती हु, लेकिनआँखो को कैसे बनाऊ ?
आँखे भी अब, INTELLIGENT हो गई है. तुने मुझे TRAIN की, इसी तरह,
मेरी आँखो को भी तुने ही TRAIN की है. इसिलिए मेरी आँखे,फिलहाल रोती नही. मम्मी, जब भी मैँ VEHICLE चलाती हु, तब पीछे बैठकर अब कोई नही कहता कि ‘धीरे चला ’. ‘धीरे चला ’ ऐसा कहने वाला अब कोई नही, इसिलिए ‘फास्ट’ चलाने की मजा नही आती. मम्मी, मेरे घर से ससुराल तक रास्ते मेँ,
एक भी U-TURN आया नही. नही तो, मैँ तुझे लेने के लिए आती. शादी के बाद घर से ससुराल जाते समय, जिस गाडी मेँ बैठकर मैने विदाई ली थी, उस गाडी के ‘REAR-VIEW MIRROR’ मैँलिखा था कि ‘ OBJECTS IN THE MIRROR ARE CLOSER THAN THEY APPEAR’.
बस, उसी काँच मेँ तुझे एक टक देखा था. तब, मुझे मालुम नही था कि जो रास्ता मुझे घर से ससुराल लेकर जा रहा है, वही रास्ता मुझे ससुराल से घर ले जा पाएगा ? मम्मी, कितने रास्ते ONE-WAY होते है. ऐसे रास्ते पर मैँ बहुत आगे निकल चुकी हु. किसी को मेरा पता पुछने का कोई अर्थ नही क्योकि
मेरा SURNAME और पता, दोनो बदल गये है.
लेकिन इन रास्तो के ऊपर WRONG SIDE मेँ भी DRIVE करके,
तुझसे मिलने पक्का आँउगी. क्योकिँ , मेरा DESTINATION तो तु ही है ,
जहा से मेरी जिंदगी की JOURNEY शुरूआत की थी.
मम्मी, मेरा DESTINATION और मेरी DESTINY दोनो तु ही तो है .
मै बचपन से ही मेरी दुनिया का स्पेलिग ‘UWORLDU’ लिखती हु. क्योकिँ MY WORLD STARTS WITH YOU AND ENDS IN YOU.
मम्मी, ससुराल आने के बाद भी मेरी दुनिया नही बदली. क्योकिँ, मेरी दुनिया तो तु है.
प्यारी मम्मी की बेटी
( एक बेटी एक लडके जेसा सोच सकती है तो एक बेटा एक बेटी जैसा क्यु नही सोचता?)

समर्पण ""डाल्यों का दगड़ी""




आज खुद भी सोचता हूँ कि मेरे पूर्वजोँ की दी हुई धरोहरों या प्राकृति प्रेम को हम लोग कितना निभा पायें है।

आज भी पीपल के पेड़ को काटते हम लोग इसलिए नही है क्योंकि इसमें देवताओं का वास् होता है ये मेरे बुजुर्गो ने हमे कहा है, लेकिन जब किताबे पढ़ी तो समझ आया कि पीपल इसलिये भी पवित्र है क्योंकि ये हमे दिन और रात ऑक्सिजन प्रदान करता है मेरे बुजुर्गो में पर्यावरण के प्रति कितना प्रेम था जो जीवन दायन है उसे देवताओं की श्रेणी में स्थान प्रदान कर दिया।
वैसे जिंदगी की भागदौड़ में कई लोग अपने समाज के लिए या यूँ कहूँ कि अपने आने वाल कल भविष्य के प्रति कितने सजक होते है ।
गाँव-गळी तक की पगडँड़ियो तक वो अपनी छाप छोड़ जाते है, मैंने अपनों बुजुर्गो से सुना है कि (फलाँ डालियों का आम जू तुम खाना छा रे वू फलड़ा बे बूबों कू लगायूँ ची रे) आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ लोग यूँ ही अपने अच्छे कर्मो की छाप छोड़ जा रहे है।
उन महान वव्यक्तित्व के धनी लोगो के लिए ये महान ऋषि जी की कितनी सटीक कहानी सुनाई गयी है हमे मेरे बुजुर्गो द्वारा,, आज आपके साथ साझा कर रहूँ


ऋषि युग के समय एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे, उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे। वर्षो से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने-अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज़ आवाज सबके कानों में पड़ी,"आप सभी मैदान में एकत्र हो जाएं। "आदेश सुनते शिष्यों ने ऐसा किया।

ऋषिवर बोले प्रिय शिष्यों आज आपका अंतिम दिन है. मै चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें. यह एक बाधा दौड़ होगी इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आख़िरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से गुजरना पड़ेगा "तो आप लोग तैयार है "? हाँ, हम तैयार है", शिष्य एक स्वर में बोले दौड़ शुरू हुई सभी तेज़ भागने लगे, वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुचें वहाँ बहुत अँधेरा था जगह जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुबने से असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था सभी असमंजस में पड़ गए जहाँ दौड़ में सभी एक समान बर्ताव कर रहे थे वहीं अब अलग अलग बर्ताव करने लगे खैर सभी ने जैसे तैसे दौड़ खत्म की और ऋषिवर के सम्मुख एकत्रित हुए । "पुत्रों मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ जल्दी पूरी की और कुछ ने अधिक समय लिया भला ऐसा क्यों ?"" ऋषिवर ने प्रश्न किया।
एक शिष्य बोला, "गुरु जी हम सभी साथ साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुँचते ही स्तिथि बदल गयी..कोई दूसरे को धक्का देने में आगे निकल रहा हुआ था तो कोई संभल-संभल के आगे बढ़ रहा था... कोई तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा उठा कर जेब में रख रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगो को पीड़ा ना सहनी पड़ें इसलिए सबने अलग अलग दौड़ पूरी की  """"ठीक है जिन लोगो ने पत्थर उठायें है वो आगे आये और वो पत्थर मुझे दिखाएँ ....."" ऋषिवर ने आदेश दिया आदेश सुनते ही कुछ शिष्य आगे आये और पत्थर निकलने लगे पर ये क्या जिन्हें वे पत्थर समझ रहे थे वो तो बहुमूल्य हीरे थे ।
सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .."" मैं जानता हूँ कि कि इन हीरों को देखकर आप लोग आश्चर्य में पड़ गए है.."" ऋषिवर बोले।" दरअसल इन्हें मैंने ही सुरंग में डाला था, और यह दूसरों के विषय में सोचने वाले शिष्यों को मेरा इनाम है। पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम-भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ ना कुछ पाने के लिए भाग रहा है. पर अंत में वही सबसे समृद् होता है जो इस भागम-भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चुकता है अतः यहाँ से जाते जाते इस बात को गांठ बांध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना  कभी ना भूले, अतः वही आपकी सबसे अनमोल जमाँ पूँजी होगी।
इसलिए आप खुश रहे क्योंकि आप सन्तुष्ट रहे।
"""पुनः पर्यावण दिवस के अवसर पर एक पेड़ तो आप सबकी तरफ से एक प्राकृति के लिए एक उपहार तो बनता है"" घर का आँगन आप "नीम के पेड़" से भी गुलज़ार कर सकते है जो ऑक्सिजन ही देता है दिन हो या रात"""

Sunday, May 27, 2018

रंगरुटी "पहाड़ी" मेरा जीवन-1

""चल रे उठ जा जल्दी उठ"









पिता जी के शब्द जो उस समय किसी 'बाण' तीर से कम नही लगते थे लगता था, कि जैसे वो सेना की ट्रेनिंग वाले हवलदार और मै वो रंगरुटी सिपाही सुबह की 4 बजे नही कि ट्रेनिंग शुरू।
वैसे फौजी ये ट्रेनिंग देश की रक्षा के लिए करते है और मै अपने जीवन यापन के लिए जहाँ जब मेहनत करूँगा तब ही तो अन्न की उपज करके अपने घर ला पाउँगा(फौजी की तुलना में मै स्वार्थी रंगरूटी)।
जी हा ये सुबह-सुबह की ट्रेनिंग का सार मेरे सुबह उठ कर खेतो में हल जोतने से शुरू होती थी ।
अब पिता जी तो उठ के बैल (बल्द) को घास और पानी देकर खुद चाय की चुस्की ले चुके होते, अब मेरे पास उठ कर कुछ चंद मिनट (कुछ टैम) चाय पीने को मिल जाती थी कभी कभी। जब तक मेरी चाय खत्म होती है पिता जी बैलों को लेके गली (गौला) पहुँच चुके होते थे, उफ्फ्फ यही से दौड़ शुरू (जो अक्सर बाबा रामदेव जी अपने आसन में करते है पैरों की कसरत) रास्ते में मेरे जैसे नींद में चलते हुए कई रंगरूट और मेरे पिता जी हवलदार जी की तरह अन्य पहाड़ी हवलदार जी भी मिल जाते थे बस मन ही मन खुद को तसल्ली देता था की इस रंगरूट में मै अकेला नही हूँ (सकून मिल जाता था) खेत पहुँचे तो सबसे पहले शुरुआत पिता जी ही करते थे (खेत के मेंडा निकलना) क्योंकि रँगरुटो को हवलदार जी खुद शुरुआत करके ही तो बताते है की शुरुआत कैसे और कब कहाँ करनी है (वैसे मै गुस्से में कभी-कभी दूसरों के खेत के किनारे तोड़ ही देता था)। 
फिर सूरज की उजली हुई किरणे उन सुनहरी प्रभात की बेला पर जब अपना प्रकाश फैलाती थी तो हर्ष की जो अनुभूति मिलती थी आज उसको कैसे बयाँ करू बस यूँ समझ लीजिये कि आज भी एक अह्सास करके मन हर्षित हो जाता है।
खेतों की हर एक जोत को जोतते हुई थकान मिटती हुई तब लगती थी जब दूर से माँ खाना (सुबह का नाश्ता) लाती हुई दिखती थी, सरपट (काली दाल की सतपोड़ी का साग और रोटी) उसे खा के जो मज़ा खेतों में आता था वो आज के स्टार होटल में भी नही है।
फिर वही से सरपट घर दौड़ के घर जाना और जल्दी कपड़े पहन के तैयार होना और फिर स्कूल की तरफ 2.5किमी दौड़ लगाना (जिसे आजकल शारीरिक रूप से स्वस्त व्यक्ति के लिए आवश्यक माना गया है) वैसे विद्यालय में भी अध्यापक हवलदार जी जो कि हमारे उज्ज्वल भविष्य की राह बनाते है एक रंगरूट की परीक्षा के लिए तैयार होते थे।
उस समय बिना लँच बॉक्स के  विद्यालय जाते थे तो फिर शाम को वही 2.5किमी की दौड़ घर की तरफ।
 लेकिन इस बार ये दौड़ कहीं रुकती ठहरती हुई आगे बढ़ती थी क्योंकि रास्ते में अनेक फलों (करोंदा-तुंग के बीज- बेर- जिनको खिला-खिला कर रामदेव जी पतंजलि को घर घर पंहुचा रहे है) का सेवन जो होता था।



घर पहुँचे खाना (झंगोरा और फांड़ू) खाया तब तक हवलदार साहब फिर पलटन परेड के लिए सामने खड़े उफ्फ्फ सीधे पानी के लिए बर्तन लिया और चल पड़े पानी लिए प्राकृतिक श्रोत (धारा) में जो घर से 500 मीटर की दुरी पर था उसके हमें कम से कम 5 चक्कर तो लगाने ही पड़ते थे। (2500)मीटर मतलब 2.5किमी।
अब थोडा खेलने का समय मिला वो भी अँधेरी होती रात जल्दी ही छीन लेती थी। जल श्रोत(पानी का धारा) की तरफ नहाने जाने की तैयारी में भी माँ की एक पुकार तैयार होती थी (जब जाणी ही छे ता एक भांडू पाणी लै जै) जब शहर में 46 डिग्री तापमान होता था तब हम अपने प्राकृतिक जल श्रोतो से ठंडे ठंडे पानी से नहाकर अपने आप को तरोताज़ा करते थे (वैसे शहरों की तरह यहाँ पानी पर कोई शुल्क नही होता था)
घर पहुँचें फिर हवलदार साहब हमारी राह में बैठे रहते(पौडं नी तिन बस खेन ही चेणु ये तै) अब हवलदार साहब एक पहरेदार की भूमिका उनकी पैनी नज़र हमारी तरफ(तब फ़ोन भी नही थे) बस पढ़ते समय कभी कभी ख्यालो में खोकर हम थोडा समय निकाल लेते थे।
खाना खाने के बाद घर के आँगन में चारपाई (खाट) लगाके तारों को गिनना और जैसे हमें बताया गया था कि चाँद और तारों को देखकर प्रणाम करके उससे कुछ मांगो तो वो हमे मिल जाता है, प्रणाम करना और कुछ (सरकारी नॉकरी) माँगना।
फिर तारों को गिनते-गिनते कब आँख लग गयी पता ही नही चलता था।
ऐसी ही होती थी एक पहाड़ पर रहने वाले रंगरूटी पहाड़ी की जिंदगी। जहां पल-पल वो अनेक साहसिक खेलो से भी वो रूबरू होता है।
और उस हवलदार रूपी पिता से जो हमे जीवन के अनेक सुख-दुःखो से सींचते है। उनकी हर एक डांट और गुस्से में हमारे जीवन की हर एक गलतियां की सुधार छुपी होती है 
वो कहते है ना जीवन में पिता वो ढाल है जो आपको जीवन के हर वो सार के महत्व को समझाते है जो जीवन के संघर्षो में आपके काम आता है।

(आज भी मेरे बुजर्गो को लम्बे और स्वस्थ जीवन का सार यही पहाड़ी जीवनशैली रही है जो हमारे जैसे अनेक लोग अब खो रहे है या खो चुके है) -देवेन्द्र पंवार


Saturday, May 26, 2018

उम्मीदों का """रिजल्ट"""










रिजल्ट .....

रिजल्ट तो हमारे जमाने मे आता था 10 दिन पहले हवा फैल जाती थी हर रात को बोला जाता था कि आज रिजल्ट है और अखबार वाला रात 12 बजे के बाद कभी भी आ सकता है

पहले 2 दिन तो आता नहीं था लेकिन जिस दिन आता था हाहाकार मच जाती थी , रोल नंबर ढूंढते ढूंढते कई सदियों का सफर बीत जाता था , कोई कंट्रोल एफ का फंक्शन तो था नही की फट से सर्च करो और मिल जाये

बेचारा अखबार वाला कोयले की खदान के मजदूर से भी ज्यादा मेहनत करता था कालेज के नाम को और रोल नंबर को ढूंढने में

जब कोई पास हो जाये तो खड़क से अखबार वाले के मुँह पर भी इतनी खुशी आ जाती थी कि चलो कुआं खोदने में समय तो लगा पर पानी आखिर मिल ही गया

जिसका रिजल्ट बस पास होता दिख जाए तो क्या खुशी जैसे कि गर्ल फ़्रेंड के साथ शादी होने पर होती है कि माता रानी ने मुराद पूरी कर दिया

उस समय पर सब निर्मोही हुआ करते थे कोई ये नही देखता था कि कौन सी डिवीजन से पास हुआ है, क्योंकि बस पास ही हो जाये कोई तो पूरे मुहल्ले और दूर दूर के गाँवो में खबर ऐसे फैलती थी कि जैसे आजकल जंगलों में लगी हुई आग फैलती है

अखबार में सिर्फ F प्रथम श्रेणी S द्वितीय श्रेणी और T तृतीय श्रेणी लिखा होता था बाकी सब गायब जैसी की मिस्टर इंडिया का अनिल कपूर बैठा हो और फेल होने वाले का रोल नंबर गायब कर दिया हो

उस पुरा पाषाण युग मे बस ऊपर लिखा हुआ कुछ दिख जाए तो रात को ही भांगड़ा शुरू हो जाता था उस समय डांस ऐसा होता था कि साक्षात माइकल जैक्सन की आत्मा घुस पड़ी हो बस शकीरा भी साथ मे होती तो मैं भी नाच लेता

जिस किसी का रोल नम्बर नही दिखता उसे बोला जाता था भाई कोई नही अगली बार मेहनत करना परंतु अखबार वाला जो रिजल्ट दिखाता है  वो मन ही मन इतनी गाली देता था कि मानो गर्लफ्रेण्ड के पिताजी ने शादी को मना किया हो तो मन के अंदर तो गालियां है परंतु बाहर से सांत्वना दे रहा हो

और सबसे बड़ा झटका तो उन्हें पड़ता था जहाँ पूरे पूरे स्कूल गांव अखबार से गायब ऐसे हुआ करते थे जैसे गब्बर सिंह जंगल से गांव आ रहा हो और गांव वाले गायब हो जाया करते थे ...

"Pahado ki ek 'Amar-Prem Gatha'















हिमालय का सौन्‍दर्य जितना आकर्षक है उतनी ही सुन्‍दर प्रेम कहानियां यहां की लोक कथाओं और गीतों में दिखाई देती हैं। उत्‍तराखंड के विभिन्‍न हिस्‍सों में प्रेम कहानियां लोकगथाओं के रूप में जन जन तक पहुंची हैं, हालांकि यह अधिकतर राजघरानों से जुड़ी हैं लेकिन वह आम आदमी तक प्‍यार का संदेश छोड्ने में कामयाब रही हैं, हरूहीत और जगदेच पंवार की कहानी तो है ही रामी बौराणी का अपने पति के इंतजार में सालों गुजारना उसके समर्पण को दर्शाता है, इन सबसे बढ्कर राजुला मालुशाही की अमर प्रेम कथा है जो प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। उत्‍तराखण्‍ड की लोककथाओं में प्रेम कथाओं का विशेष महत्‍व हें यह लोक गाथाओं के रूप में गाई जाती है, हालांकि अलग अलग हिस्‍सों में इन कहानियों को अपनी तरह से लोक गायकों ने प्रस्‍तुत किया है लेकिन जब समग्रता से इसे देखते हैं तो कुछ कहानियां ऐसी हैं जिन्‍होंने उन पात्रों को आज भी गांवों में जीवंत रखा है। यहां प्रचलित कहानियों की पृष्‍ठभूमि में विषम भौगोलिक परिस्थितियों से उपजी दिक्क्तें साफ झलकती हैं। राजुला मालुशाही की गाथा कितनी अमर है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है साइबर युग में जहां प्रेम की बात संचार माध्‍मों से हो रही हो वहां भोट की राजुला का वैराट, चौखुटिया आने और मालूशाही का भोट की कठिन यात्रा प्रेमियों का आदर्श है।

कुमाऊं और गढ्वाल में प्रेम गाथायें झोड़ा, चांचरी, भगनौले और अन्‍य लोक गीतों के माध्‍यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सुनी सुनाई जाती रही हैं, मेले इनको जीवन्‍त बनाते हैं। राजुला मालुशाही पहाड् की सबसे प्रसिद्व अमर प्रेम कहानी है। यह दो प्रेमियों के मिलन में आने वाले कष्‍टों, दो जातियों, दो देशों, दो अलग परिवेश में रहने वाले प्रेमियों की कहानी है। सामाजिक बंधनों में जकड़े समाज के सामने यह चुनौती भी थी। यहां एक तरफ बैराठ का संपन्‍न राजघराना है, वहीं दूसरी ओर एक साधारण व्‍यापारी, इन दो संस्कृतियों का मिलन आसान नहीं था। लेकिन एक प्रेमिका की चाह और प्रेमी का समर्पण पेम की एक ऐसी इबारत लिखता है जो तत्‍कालीन सामाजिक ढ्ाचे को तोड्ते हुए नया इतिहास बनाती है।

राजुला मालूशाही की जो लोकगाथा प्रचिलत है वह इस प्रकार है- कुमांऊं के पहले राजवंश कत्‍यूर के किसी वंशज को लेकर यह कहानी है, उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्‍होंने कई मनौतियां मनाई। अन्‍त में उन्‍हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्‍हें संतान की प्राप्‍ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्‍यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे।  दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड्का और लड्की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया।  समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्‍दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्‍य सबको अपनी ओर खींचता था।
पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवे दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा।”  राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया।  लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।
धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे….राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लड़की को रंगीली वैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा। एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि
मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी? पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा? देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”
उसकी मां ने उत्तर दिया दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट
तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।
वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया।  लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।”   यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।
गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके।
तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोड़कर? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने।  रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।
मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोलादे माई भिक्षा!तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ले जोगी भिक्षापर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखतातो राजुला ने कहा कि मैं सुनपति शौका की लड़की राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या हैतो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा
तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।
सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर वैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोड़्कर जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।


 कितने सरे सपने होते है किसी हम जैसे लोअर मिडिल क्लास के एक तो पहाड़ो से दूसरा शहर की आपाधापी से दूर जहां न ज्यादा गाड़ियों की आवाजे है न दिन...