पहाड़ी मुल्क
Wednesday, September 28, 2022
कितने सरे सपने होते है किसी हम जैसे लोअर मिडिल क्लास के एक तो पहाड़ो से दूसरा शहर की आपाधापी से दूर जहां न ज्यादा गाड़ियों की आवाजे है न दिन रात की भागदौड़ बस है तो सुबह उठे खेतो में गए या जंगल घास लकड़ी लेने बस इसी से इन पहाड़ो की दिनचर्या चलती रहती है पर उस अभागी बिटिया अंकिता को क्या पता था इन सुनसान और नरम पहाड़ो में अब दानव रूपी असुर आ चुके है
पुनः भावना से दिवंगत बेटी अंकिता की आत्मा की शांति प्रार्थना
Tuesday, November 5, 2019
Monday, April 1, 2019
Monday, August 6, 2018
रुद्रनाथ जी यात्रा भाग 1
पंच केदार में एक रुद्रनाथ जी के बारे में अभी तक पढ़ा और सुना ही था और हिमालय की गोद में बसा भगवान महादेव जी का यह स्थल अत्यंत दुर्गम एवं कठिन यात्रा मानी जाती है।
विगत समय से इस यात्रा को करने की मेरी प्रबल इच्छा थी क्योंकि पंच केदारों के साथ-साथ यह हिमालय की गोद में बसा है और मै खुद एक हिमालय वासी हूँ अतः निश्चय किया कि यह यात्रा की जाय वो भी सावन (सौण) के महीने में इस यात्रा में 4 जने यात्रा के लिए तैयार थे वैसे सावन के महीने में हिमालय पहाड़ो में यात्रा करना अपने आप में किसी कठिन परीक्षा से कम नही है अतः 5 अगस्त से यात्रा हमने शुरू की मेरे साथ मेरे दो जीजा जी श्री रावत जी श्री बिष्ट जी और मेरे मित्र नेगी जी भी तैयार हो गए।
सुबह 10.30 नंदप्रयाग धाट में पहुँचे ही थे भोलेनाथ ने हमारी परीक्षा शुरू कर दी पुरे 5 घण्टे सड़क पर मलबा आने से जाम में फंस गए और ऊपर से मौसम खराब साथ ही मौसम विभाग का अलर्ट की पूरे 72 घण्टे भारी बारिश और ये 72 घण्टे हमारे अब शुरू होने वाले थे वो भी पहाड़ो में।
वैसे गोपेश्वर पहुँचने पर भारी बारिश हमारा इंतजार कर रही थी। यहाँ दोपहर का खाना खाया और निकल।पड़े।
गोपेश्वर से पांच किलोमीटर आगे चलते ही सग्गर मिल गया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अरे! सग्गर तो इसी सडक पर है। हम रुके, स्थानीयों से पक्का कर लिया कि यही सग्गर है और यहीं से रुद्रनाथ का रास्ता जाता है। यहां से दस किलोमीटर आगे इसी सडक पर मण्डल है और फिर यही सडक आगे चोपता और ऊखीमठ चली जाती है।
शाम के साढ़े चार बजे थे। अभी भी दो घण्टे तक रोशनी रहेगी, इसलिये आगे बढा जा सकता है। दुकान वाले ने बताया कि यहां से चार किलोमीटर आगे पुंग बुग्याल है। वहां रुकने का इंतजाम है। उससे ढ़ाई-ढ़ाई
किलोमीटर आगे अगले ठिकाने है। रास्ता चढाई भरा है, यह तो सग्गर से दिख ही रहा था। चार किलोमीटर यानी दो घण्टे। इसका मतलब आज हम पुंग बुग्याल या उससे आगे ठिकानों में रुकेंगे। ठीक साढ़े चार बजे हम चल दिये।
आज का ज्यादातर पैदल रास्ता बसावट से होकर जाता है। चारों तरफ हरे-भरे खेत बडे अच्छे लग रहे थे। बारिश और बादलों संग हम आगे बढते गए।
इसी दौरान एक जंगली बिल्ली दिखी जो कौवे का शिकार करके भागी चली जा रही थी।
दो किलोमीटर बाद एक विश्राम शेड मिला। यहां पहुंचे तो थकान से चूर-चूर हो रहे थे, सोच थोड़ा चाय की चुस्की ले ले।
फिर यहां से पथराई चट्टानों से चढ़ाई की शुरुआत हुई जो वीरान जंगलो से होकर गुजरता है
पांच बजकर पचास मिनट पर जब पुंग बुग्याल में प्रवेश किया।
आइडिया एयरटेल वोडाफ़ोन पुंग बुग्याल में काम करते हैं। घने जंगल से घिरा हुआ यह छोटा सा बुग्याल है। बुग्याल का अर्थ होता है घास का मैदान। ये छोटे छोटे भी होते हैं और बडे-बडे विशाल भी। विशाल बुग्याल अक्सर 3000 मीटर से 4000 मीटर के बीच में मिलते हैं जैसे दयारा, बेदिनी आदि; जबकि 3000 मीटर से कम ऊंचाई पर जंगलों में छोटे-छोटे बुग्याल मिलते हैं।
सग्गर (30°26’20.05”, 79°19’12.63”) समुद्र तल से 1670 मीटर ऊपर है जबकि पुंग बुग्याल (30°27’11.21”, 79°20’05.27”) की ऊंचाई 2255 मीटर है। यानी 4 किलोमीटर में ही 585 मीटर की ऊंचाई। निश्चित ही यह काफी तेज चढाई है।
यहां थकान भी लगी हुई थी तो चाय पिने का मन हुआ जैसे ही गरमा गरम चाय मिली मज़ा आया पता नही ऐसी चाय की आवश्यक्ता पहले कब महसूस हुई। पता नहीं देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसा होता है या नहीं लेकिन मेरे हिमालय में यही होता है। आप थके-हारे किसी लकडी और फूस की दुकान में पहुंचते हो और आपको बिना कहे चाय मिल जाये- बस यही आनन्द की पराकाष्ठा है। फिर पुंग बुग्याल जैसी जगह हो। चारों तरफ घना जंगल- भालुओं, तेंदुओं और बारहसिंहों से घिरा- और आप अँधेरे से पहले किसी लकड़ी की झोपडी में बैठे हो और आपको चाय मिल जाये। अभी हमारे पास थोडा समय था सोचा कल के लिए दुरी कुछ कम की जाय अतः हमने पुंग बुग्याल से सफर जारी करने का निर्णय लिया यहां से 5 किलोमीटर की दुरी पर मौली खरक है घने जंगलों और पानी के गाड़ गधेरों को तरते हुए खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए सांसे ऐंसी फूल रही थी मानो कलेजा बाहर आ जाए।
मुझे नही पता ऐसी चढ़ाई कब चढ़ी थी। मेरे बैग को नेगी जी लेके जा रहे थे। क्योंकि मेरी हालत चलने की नही हो रही थी
भारी बारिश खड़ी चढ़ाई वो भी सीढ़ियों नुमा साथ ही घने जंगलो के बीच धुप्प अँधेरा शरीर को इतना कमज़ोर होते हुए कभी नही देखा। पुरे 5 घण्टे सफर के बाद मौली खरक पहुचें।
रात 10 बजे हमे पता नही था कि ठिकाना मिले या नही लेकिन हमारे पहुँचते ही उन्होंने बुला कर अंदर बिठाया सच कहूँ तो ये सब मेरे पहाड़ में ही मुमकिन है।
थकान इतनी थी कि कदम खड़े रहने की स्तिथि में भी नही थे बारिश अभी भी लगी हुई थी सीधे ढेरे में घुसे जल्दी से रैनकोट और गीले कपड़े उतारे सूखे कपड़े पहने फिर बिस्तर पर लेटकर गर्म चाय की चुस्की ली।
सोने लगे तो कुछ गद्दे नीचे बिछाये और कुछ रजाई-कम्बल ऊपर ओढे। कौन सा आज ओढने-बिछाने की कुछ कमी थी?
रात बाहर खट-खट जैसी आवाजें आने लगीं। दुकान वाला उठा। उससे पूछा तो बताया कि बाहर बारहसिंहे हैं। वैसे इतनी चढ़ाई पर मुझे साँस की समस्या होने लगती है खासकर रात में मुझे रात में सोने में थोड़ी तकलीफ हुई।
आगे का सफर जारी रहेगा----
Friday, June 29, 2018
**कुछ यूँही जो यादों में है...**
"""आज यादों के झरोंखे से कुछ कहने का मन है"" सुनिये तो जरा~~~~~~~
हम पहाड़ के देहाती बच्चे थे । प्राथमिक स्कूल की शुरुवात घर से ही तख्ती (पाटी) लेकर स्कूल जाना स्लेट को थूक, अपने कपड़ों या हाथ से लिखा हुआ मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी । बांस की पतली कलम से सफ़ेद मिटटी को पानी में घोल कर कलम से उसका इस्तेमाल स्याही की तरह करते थे ।
तख्ती को पोतना,दवात के तलवे से घोटा लगाना, अगले दिन की तैयारी होती थी तख्ती को एक विशेस घास (कुणजू, कंदूरी के पत्ते इत्यादि) से बड़ी तन्मयता से घोटा जाता था। और कभी हफ्ते में उल्टे तवे की कालिख को तख्ती (पाठी) पर लगाकर, इसी कालिख में हमारे हाथ, गाल, नाक आदि भी रंगीन हो जाया करते थे, पर लगन इतनी कि बाद में तख्ती विशेष चमक हमारे चेहरों पर भी एक खास चमक ले आती थी, मानो हम अब पूरी तरह से तैयार है। किताबी ज्ञान के अतिरिक्त, हाथ की लिखावट का भी अपना एक महत्व था।
पांचवी तक आते आते, तख्ती का स्थान कॉपियों ने, कलम का स्थान आधुनिक(होल्डर) ने एवम् मिटटी की स्याही का स्थान भी रासायनिक आधुनिक नीली स्याही ने ले लिया था ।
लेकिन निब वाले पैन अथवा बॉलपैन से अभी भी कोशो दूर थे। बल्कि बॉल पैन का उपयोग करना गुरुजनों की दृष्टि में जघन्य अपराध था, इसका अपराध बोध वे समय समय पर हमें करवाते रहते भी थे।
मास्टरजी की लिए चाय बनाना या उनका निजी काम करना, अपने आप में सर्वश्रेस्ठ कार्य माना जाता था, सर्वश्रेस्ठ विधार्थी का तमगा जो मिल जाता था। इसके लिए किसी लिखित सर्टिफिकेट की आवस्यकता भी नहीं थी, मास्टर जी के बोल ही आवश्यक थे।
अक्सर स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में, घर से बेकार कपडा या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जातें थे और गुरुजनों के उपयोग के लिए हर एक विद्यार्थी घर से एक जलावन की लकड़ी लेकर जाता था। आसमानी नीली और खाकी पेंट में जब पहली दफा बड़े स्कूल में कदम रखा तो बड़े होने के अहसास के साथ-साथ एक गूढ़ अनजान डर भी था ।जो करीब कुछ महीनो तक रहता ।
कक्षा छः में पहली दफा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार A, B,C, D भी देखी। कैपिटल लैटर तो ठीक थे किंतु स्मॉल लेटर में बढ़िया एफ या जे बनाना हमें बाद तक भी न आया था। करसीव राइटिंग तो आज तक न सीख पाए । और अंग्रेजी से मुक्ति की अभिलाषा तो यूँ थी मानों आज़ादी के मतवालों की अंग्रेजों से मुक्ति पाने की हो। पर बीच बीच मे अंग्रेजी के गुरुजी किसी जनरल डायर की तरह अत्यचार करके हमारी अंग्रेजी से मुक्ति की अभिलाषा का दमन कर ही देते थे।
हम पहाड़ी बच्चों की अपनी एक अलग ही मस्त दुनिया थी।
स्वयं से सिले कपड़े के बस्ते (bag) में किताब और कापियां लगाने का हमारा विन्यास अधिकतम रचनात्मक कौशल की श्रेणी में आता था, इतना कि विद्यार्थियों के बीच चर्चा का विषय भी होता।
नई क्लास के लिए किताबो का स्वयं से प्रबंध अपने सीनियर भाई बहनों एवम् जान पहचान वालों से करना, अपने आप में महभारत की कूटनीति (Diplomacy) होती थी। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब उन पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव होता था। और गर्मियों की छुटियों में पुरानी किताबो की उपलब्धता के लिए पूरे महीने चर्चा करते थे, फटी हुई पुरानी किताबों को गेंहूँ के आटे को घोलकर बनाई गई लोई (gum) से चिपकाते और उस पर सुंदर लेखन से अपना नाम लिखने में जो आनंद प्राप्त होता आज किसी अन्य कार्य से प्राप्त सुख से तोला नहीं जा सकता।
गाँव से रोज़ सुबह कतार बना कर चलना,दूर दाराज के बच्चो को पगडंडियों में एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा में चलते देखना और प्रार्थना से पहले स्कूल पहुंचना,अपने आप में एक सुखद, कसमकस और अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी।
स्कूल में पिटते, मुर्गा बनतें मगर हमारा अहम (Ego) हमें कभी परेशान न करता था, हम देहात के बच्चे शायद तब तक जानते भी नही थे कि ego होता क्या है।
क्लास की पिटाई का रंज और गम अगले ही घंटे में काफूर हो जाता था और हम फिर से अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते और खेलते पाए जाते। आज बच्चो को डांट देने मात्र से कैसे बच्चे मानसिक दबाव में आ जाते होंगे, इसका अंदाज़ लगाना एक देहाती के लिए थोड़ा मुश्किल होगा।
रोज़ सुबह प्रार्थना के समय पी०टी० (फिजिकल ट्रेनिंग) के दौरान एक हाथ फांसला लेना मगर फिर भी धक्का मुक्की में अड़ते भिड़ते,सावधान-विश्राम करते रहना भी अपने आप मे एक कला थी।
स्कूल हाफ टाइम में सब अपने अपने रुचिनुसार आनंदित होते कोई खेलते हुए ,कोई गप्पे मारते एवम् अगले घंटे के विषय एवम् टीचर पर चर्चा करते हुए, कुछ लोकल मार्किट में चाय या पाकीजा (एक बिस्किट विशेष ब्रांड) खाते या कुछ दबंग आसपास किसी दरख़्त , झाड़ी या स्कूल के के पीछे बीड़ी या तम्बाकू (प्रिंस गुटखा या हाथीगोला खैनी) का आदानप्रदान करते करते थे।
छुट्टी की घंटी बजती ही मानो थके हारे शरीर में 400 वोल्ट का करंट कुलाचे मारता था और चेहरे पे एक अनुपम लालिमा आ जाती थी । घर की तरफ बढ़ने की गति सुबह की आने की गति से कई गुना बढ़ जाती थी। घर जाके घर के बासी खाने में या अल्प खाने में वो स्वाद और तृप्तत्ता आती जो आज तक कोई 5 स्टार होटल नहीं दे पाया ।
कमाल का बचपन था वो । गाव में नदी/गदेरो/पोखरों में जमे पानी में 20-25 बच्चे एक साथ नहाते दिन में कई बार बड़ी बड़ी चट्टानों और रेत में धुप लेना , पेड़ों पर चढ़कर पसीने से सराबोर होके फिर से डुबकी मारना यह सतत प्रक्रिया पूरे दिन चलती रहती।
लेकिन, मजे की बात यह थी कि हमें कभी एलर्जी या अन्य तबियत ख़राब नही होती थी। कमाल का पहाड़ी शरीर था साहब ! डॉक्टर तो शायद वर्षो में दिखते थे और वो भी देहाती ही होते थे ।
लड़कियों का एक बहुत प्रमुख खेल पिड्डू जिसमे जमीन पर लाइन खीचकर एक गोल पत्थर को एक पैर से लात मारकर हर खाने में बिना लाइन को छुए आगे बढ़ाना होता था, एक सांस मे बित्ती-बित्ती,बित्ती-बित्ती-बिता बोलना और अंतिम step में आँख बंद करके आगे बढकर अलमा रैट (जिसका वास्तविक अर्थ होता था am I right) बोलकर साथी से जमीन पर बनी रेखाओं से बचकर निकलने की दिशा लेना होता था।
खेल भी ऐसे जिनमे बिना अंपायर के बत्ती कसम/विद्या कसम के सत्यापन से ही खेल की हार जीत का निर्णय चलता था। और लड़को का खेल तो कंचे , क्रिकेट ,पिट्ठू , छुपन छुपाई आदि।
और हाँ रात को चैन कहाँ, रात्रि में कखड़ी, मुंगरी, लीची, आम आदि ऋतुनुसार फल चुराना हम देहाती बच्चों का खेलो में शामिल होता था ।
अच्छा हमारी एकता भी बड़ी अटूट होती थी, हम अपने ही घर की ककड़ी या फल दोस्तों के साथ चुराकर फिर चुपके से सब मिलजुल के खाते और दूसरे दिन बड़ी सतर्कता से घरवालो के साथ चोरी की तफ्तीश् में जुट जाने का अबोध स्वांग भी करते । अति विशिष्ट सुखद अनुभव देती थी वो वो छोटी छोटी फलों की चोरियां । और कमाल के बुजुर्ग थे वो जो सिर्फ गालियों तक ही इन चोरियों की रिपोर्ट लिखते थे। पटवारी, पुलिस का उनके जीवन मे कोई महत्व था भी नहीं।
हम देहात के बच्चों का सपनें देखने का सलीका भी अलग है। हम कभी नहीं सिख पाते अपने प्यार का इज़हार करना, माँ-बाप, पत्नी आदि को कभी नहीं शब्दो मे बता पाते कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं।
हम देहाती बच्चें गिरतें सम्भलतें, लड़ते-भिड़ते ही नई दुनिया का हिस्सा बन पाते है। कुछ मंजिल पा जाते है, कुछ यूं ही खो जाते है। एकलव्य होना हमारी नियति है शायद। हम देहाती बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन नहीं होती पर हर ब्लैक एंड व्हाइट में भी रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं।
पढ़ाई फिर नौकरी के सिलसिलें में लाख शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवनपर्यन्त हमारा पीछा करते रहते है, नही छोड़ पाते है सुड़क-सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना, बिना रुमाल के ही बड़ी पार्टियों में शामिल होना। अनजान जगह पर भी संकोच में रास्ता न पूछना या फिर अगर एक से पूछ लिया तो उससे ही पूरा विस्तार से पूछना कि रास्ता बताने वाला असहज़ सा महसूस करने लगें।
नहीं सिख पाते कपड़ो की सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना। ये सब कुछ हमें नही आता है।
अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख़्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जाने कहाँ से अचानक जुटा लाते है आत्मविश्वास।
हम पहाड़ से निकलें बच्चे, थोड़े अलग नही बल्कि पूरी तरह अलग होते है। अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा सबके साथ पाते है । हम बड़े शहरों के लोगों के साथ उठ-बैठ कर घुलमिल तो जाते है किंतु जीवन अपना ही जीते है।
अंदर से एक पहाड़ी बचपन और वो सुनहरी निस्वार्थ सोच, प्रेम, हमें अंदर से भी ता-उम्र हमें एक पहाड़ी बनाये रखती है ।
मुझे गर्व है वो ठेठ पहाड़ी अभी भी मेरे अंदर जीवित है और मेरी सार्थक पहचान और परिचय भी है।।।।।। थोड़ा प्रासंगिक थोड़ा अप्रासंगिक|
हम पहाड़ के देहाती बच्चे थे । प्राथमिक स्कूल की शुरुवात घर से ही तख्ती (पाटी) लेकर स्कूल जाना स्लेट को थूक, अपने कपड़ों या हाथ से लिखा हुआ मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी । बांस की पतली कलम से सफ़ेद मिटटी को पानी में घोल कर कलम से उसका इस्तेमाल स्याही की तरह करते थे ।
तख्ती को पोतना,दवात के तलवे से घोटा लगाना, अगले दिन की तैयारी होती थी तख्ती को एक विशेस घास (कुणजू, कंदूरी के पत्ते इत्यादि) से बड़ी तन्मयता से घोटा जाता था। और कभी हफ्ते में उल्टे तवे की कालिख को तख्ती (पाठी) पर लगाकर, इसी कालिख में हमारे हाथ, गाल, नाक आदि भी रंगीन हो जाया करते थे, पर लगन इतनी कि बाद में तख्ती विशेष चमक हमारे चेहरों पर भी एक खास चमक ले आती थी, मानो हम अब पूरी तरह से तैयार है। किताबी ज्ञान के अतिरिक्त, हाथ की लिखावट का भी अपना एक महत्व था।
पांचवी तक आते आते, तख्ती का स्थान कॉपियों ने, कलम का स्थान आधुनिक(होल्डर) ने एवम् मिटटी की स्याही का स्थान भी रासायनिक आधुनिक नीली स्याही ने ले लिया था ।
लेकिन निब वाले पैन अथवा बॉलपैन से अभी भी कोशो दूर थे। बल्कि बॉल पैन का उपयोग करना गुरुजनों की दृष्टि में जघन्य अपराध था, इसका अपराध बोध वे समय समय पर हमें करवाते रहते भी थे।
मास्टरजी की लिए चाय बनाना या उनका निजी काम करना, अपने आप में सर्वश्रेस्ठ कार्य माना जाता था, सर्वश्रेस्ठ विधार्थी का तमगा जो मिल जाता था। इसके लिए किसी लिखित सर्टिफिकेट की आवस्यकता भी नहीं थी, मास्टर जी के बोल ही आवश्यक थे।
अक्सर स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में, घर से बेकार कपडा या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जातें थे और गुरुजनों के उपयोग के लिए हर एक विद्यार्थी घर से एक जलावन की लकड़ी लेकर जाता था। आसमानी नीली और खाकी पेंट में जब पहली दफा बड़े स्कूल में कदम रखा तो बड़े होने के अहसास के साथ-साथ एक गूढ़ अनजान डर भी था ।जो करीब कुछ महीनो तक रहता ।
कक्षा छः में पहली दफा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार A, B,C, D भी देखी। कैपिटल लैटर तो ठीक थे किंतु स्मॉल लेटर में बढ़िया एफ या जे बनाना हमें बाद तक भी न आया था। करसीव राइटिंग तो आज तक न सीख पाए । और अंग्रेजी से मुक्ति की अभिलाषा तो यूँ थी मानों आज़ादी के मतवालों की अंग्रेजों से मुक्ति पाने की हो। पर बीच बीच मे अंग्रेजी के गुरुजी किसी जनरल डायर की तरह अत्यचार करके हमारी अंग्रेजी से मुक्ति की अभिलाषा का दमन कर ही देते थे।
हम पहाड़ी बच्चों की अपनी एक अलग ही मस्त दुनिया थी।
स्वयं से सिले कपड़े के बस्ते (bag) में किताब और कापियां लगाने का हमारा विन्यास अधिकतम रचनात्मक कौशल की श्रेणी में आता था, इतना कि विद्यार्थियों के बीच चर्चा का विषय भी होता।
नई क्लास के लिए किताबो का स्वयं से प्रबंध अपने सीनियर भाई बहनों एवम् जान पहचान वालों से करना, अपने आप में महभारत की कूटनीति (Diplomacy) होती थी। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब उन पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव होता था। और गर्मियों की छुटियों में पुरानी किताबो की उपलब्धता के लिए पूरे महीने चर्चा करते थे, फटी हुई पुरानी किताबों को गेंहूँ के आटे को घोलकर बनाई गई लोई (gum) से चिपकाते और उस पर सुंदर लेखन से अपना नाम लिखने में जो आनंद प्राप्त होता आज किसी अन्य कार्य से प्राप्त सुख से तोला नहीं जा सकता।
गाँव से रोज़ सुबह कतार बना कर चलना,दूर दाराज के बच्चो को पगडंडियों में एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा में चलते देखना और प्रार्थना से पहले स्कूल पहुंचना,अपने आप में एक सुखद, कसमकस और अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी।
स्कूल में पिटते, मुर्गा बनतें मगर हमारा अहम (Ego) हमें कभी परेशान न करता था, हम देहात के बच्चे शायद तब तक जानते भी नही थे कि ego होता क्या है।
क्लास की पिटाई का रंज और गम अगले ही घंटे में काफूर हो जाता था और हम फिर से अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते और खेलते पाए जाते। आज बच्चो को डांट देने मात्र से कैसे बच्चे मानसिक दबाव में आ जाते होंगे, इसका अंदाज़ लगाना एक देहाती के लिए थोड़ा मुश्किल होगा।
रोज़ सुबह प्रार्थना के समय पी०टी० (फिजिकल ट्रेनिंग) के दौरान एक हाथ फांसला लेना मगर फिर भी धक्का मुक्की में अड़ते भिड़ते,सावधान-विश्राम करते रहना भी अपने आप मे एक कला थी।
स्कूल हाफ टाइम में सब अपने अपने रुचिनुसार आनंदित होते कोई खेलते हुए ,कोई गप्पे मारते एवम् अगले घंटे के विषय एवम् टीचर पर चर्चा करते हुए, कुछ लोकल मार्किट में चाय या पाकीजा (एक बिस्किट विशेष ब्रांड) खाते या कुछ दबंग आसपास किसी दरख़्त , झाड़ी या स्कूल के के पीछे बीड़ी या तम्बाकू (प्रिंस गुटखा या हाथीगोला खैनी) का आदानप्रदान करते करते थे।
छुट्टी की घंटी बजती ही मानो थके हारे शरीर में 400 वोल्ट का करंट कुलाचे मारता था और चेहरे पे एक अनुपम लालिमा आ जाती थी । घर की तरफ बढ़ने की गति सुबह की आने की गति से कई गुना बढ़ जाती थी। घर जाके घर के बासी खाने में या अल्प खाने में वो स्वाद और तृप्तत्ता आती जो आज तक कोई 5 स्टार होटल नहीं दे पाया ।
कमाल का बचपन था वो । गाव में नदी/गदेरो/पोखरों में जमे पानी में 20-25 बच्चे एक साथ नहाते दिन में कई बार बड़ी बड़ी चट्टानों और रेत में धुप लेना , पेड़ों पर चढ़कर पसीने से सराबोर होके फिर से डुबकी मारना यह सतत प्रक्रिया पूरे दिन चलती रहती।
लेकिन, मजे की बात यह थी कि हमें कभी एलर्जी या अन्य तबियत ख़राब नही होती थी। कमाल का पहाड़ी शरीर था साहब ! डॉक्टर तो शायद वर्षो में दिखते थे और वो भी देहाती ही होते थे ।
लड़कियों का एक बहुत प्रमुख खेल पिड्डू जिसमे जमीन पर लाइन खीचकर एक गोल पत्थर को एक पैर से लात मारकर हर खाने में बिना लाइन को छुए आगे बढ़ाना होता था, एक सांस मे बित्ती-बित्ती,बित्ती-बित्ती-बिता बोलना और अंतिम step में आँख बंद करके आगे बढकर अलमा रैट (जिसका वास्तविक अर्थ होता था am I right) बोलकर साथी से जमीन पर बनी रेखाओं से बचकर निकलने की दिशा लेना होता था।
खेल भी ऐसे जिनमे बिना अंपायर के बत्ती कसम/विद्या कसम के सत्यापन से ही खेल की हार जीत का निर्णय चलता था। और लड़को का खेल तो कंचे , क्रिकेट ,पिट्ठू , छुपन छुपाई आदि।
और हाँ रात को चैन कहाँ, रात्रि में कखड़ी, मुंगरी, लीची, आम आदि ऋतुनुसार फल चुराना हम देहाती बच्चों का खेलो में शामिल होता था ।
अच्छा हमारी एकता भी बड़ी अटूट होती थी, हम अपने ही घर की ककड़ी या फल दोस्तों के साथ चुराकर फिर चुपके से सब मिलजुल के खाते और दूसरे दिन बड़ी सतर्कता से घरवालो के साथ चोरी की तफ्तीश् में जुट जाने का अबोध स्वांग भी करते । अति विशिष्ट सुखद अनुभव देती थी वो वो छोटी छोटी फलों की चोरियां । और कमाल के बुजुर्ग थे वो जो सिर्फ गालियों तक ही इन चोरियों की रिपोर्ट लिखते थे। पटवारी, पुलिस का उनके जीवन मे कोई महत्व था भी नहीं।
हम देहात के बच्चों का सपनें देखने का सलीका भी अलग है। हम कभी नहीं सिख पाते अपने प्यार का इज़हार करना, माँ-बाप, पत्नी आदि को कभी नहीं शब्दो मे बता पाते कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं।
हम देहाती बच्चें गिरतें सम्भलतें, लड़ते-भिड़ते ही नई दुनिया का हिस्सा बन पाते है। कुछ मंजिल पा जाते है, कुछ यूं ही खो जाते है। एकलव्य होना हमारी नियति है शायद। हम देहाती बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन नहीं होती पर हर ब्लैक एंड व्हाइट में भी रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं।
पढ़ाई फिर नौकरी के सिलसिलें में लाख शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवनपर्यन्त हमारा पीछा करते रहते है, नही छोड़ पाते है सुड़क-सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना, बिना रुमाल के ही बड़ी पार्टियों में शामिल होना। अनजान जगह पर भी संकोच में रास्ता न पूछना या फिर अगर एक से पूछ लिया तो उससे ही पूरा विस्तार से पूछना कि रास्ता बताने वाला असहज़ सा महसूस करने लगें।
नहीं सिख पाते कपड़ो की सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना। ये सब कुछ हमें नही आता है।
अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख़्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जाने कहाँ से अचानक जुटा लाते है आत्मविश्वास।
हम पहाड़ से निकलें बच्चे, थोड़े अलग नही बल्कि पूरी तरह अलग होते है। अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा सबके साथ पाते है । हम बड़े शहरों के लोगों के साथ उठ-बैठ कर घुलमिल तो जाते है किंतु जीवन अपना ही जीते है।
अंदर से एक पहाड़ी बचपन और वो सुनहरी निस्वार्थ सोच, प्रेम, हमें अंदर से भी ता-उम्र हमें एक पहाड़ी बनाये रखती है ।
मुझे गर्व है वो ठेठ पहाड़ी अभी भी मेरे अंदर जीवित है और मेरी सार्थक पहचान और परिचय भी है।।।।।। थोड़ा प्रासंगिक थोड़ा अप्रासंगिक|
Wednesday, June 20, 2018
आछरियों के मुल्क में - (काल्पनिक कहानी)
आज भिलंगना घाटी में
(थौलधार ) विवाह समारोह में आना हुआ । ।
सामने जो ऊंची चोटी दिख रही है ,वह है खैट पर्वत (समुद्रतल से ऊंचाई - लगभग दस हजार फीट )। इस क्षेत्र को आछरियों का मुल्क भी कहा जाता है। 9 आछरियाँ रहती हैं इस मुल्क में (गढ़वाल में विभिन्न क्षेत्रों को आज भी मुल्क ही कहा जाता है )।
आछरी माने परी -तिलिस्मी कन्या या अप्सरा , इन्हें वन देवी भी माना जाता है । मान्यता है कि अगर कोई सुदर्शन युवक इस क्षेत्र में जाता था ,और वो आछरियों को पसंद आ जाता था तो आछरियाँ उसका हरण कर लेती थी और फिर वह युवक उनके मोहपाश में बंध कभी वापिस घर नहीं लौटता था।
आज खैट पर्वत की तलहटी में टहल रहा था तो एकाएक आछरियों से मुलाकात हो गयी । लोक मान्यताओं के अनुसार चपल -चंचल -चितभावन न दिख कर कुछ उदास -अनमनी -असहज सी दिख रहीं थी सब । मैंने उदासी का कारण पूछा तो उनकी आंखों में छाए उदासी के बादल बरस पड़े ।
बहुत जोर देने के बाद आछरियों ने कहा जब हम पर यह इल्जाम लगा करता था कि हम युवाओं का हरण कर लेती हैं ,तब उस वक्त इस क्षेत्र के गांवों में जीवन की रौनक रहा करती थी । धन -धान्य -फलों -फूलों से भरपूर । घाटी में बहने वाली भिलंगना नदी की तरह यहां भी जीवन कल -कल कर बहता था । साल दो साल में कभी कोई युवक हमारा हो अपना घर भूल भी जाता था तो भी गांव युवाओं के गीत-संगीत- नृत्य से खिलखिलाता रहता था ।
पर अब तो दिल्ली -देहरादून -मुम्बई में बैठी विकास की आछरियों ने सब बदल दिया है । जो गया वहीं का हो गया । घाटी में भिलंगना का मुक्त प्रवाह जब से रुका ,पर्वतों -वनों में जीवन का प्रवाह थम सा गया है । अब हम कितना ही मोहने की कोशिश करें किसी को , वो हमारी लाख कोशिशों के बावजूद विकास की आछरियों के मोहपाश में बंध चला जाता है । पहले गांवों में विद्युत ऊर्जा न थी पर जीवन ऊर्जा भरपूर थी ,अब बिजली तो है पर बेजान है , जीवन ऊर्जा लुप्त हो गयी ।
ऐसा कह आछरियाँ जाने लगीं तो मैंने कहा अगर बुरा न मानों तो एक सेल्फी हो जाय तुम्हारे साथ । आजकल आधुनिकता का प्रचलन है कि किसी का दुख हो या शोक , सेल्फी जरूर खींचनी चाहिए ।
एक सेल्फी उदास आछरियों के साथ खींची ,और कभी बिजली की चपलता से चलने वाली आछरियाँ भारी कदमों का बोझ लिए धीरे धीरे वीरान निर्जीव जंगल की तरफ चली गईं ।
#पलायन एक समस्या
आज भिलंगना घाटी में
(थौलधार ) विवाह समारोह में आना हुआ । ।
सामने जो ऊंची चोटी दिख रही है ,वह है खैट पर्वत (समुद्रतल से ऊंचाई - लगभग दस हजार फीट )। इस क्षेत्र को आछरियों का मुल्क भी कहा जाता है। 9 आछरियाँ रहती हैं इस मुल्क में (गढ़वाल में विभिन्न क्षेत्रों को आज भी मुल्क ही कहा जाता है )।
आछरी माने परी -तिलिस्मी कन्या या अप्सरा , इन्हें वन देवी भी माना जाता है । मान्यता है कि अगर कोई सुदर्शन युवक इस क्षेत्र में जाता था ,और वो आछरियों को पसंद आ जाता था तो आछरियाँ उसका हरण कर लेती थी और फिर वह युवक उनके मोहपाश में बंध कभी वापिस घर नहीं लौटता था।
आज खैट पर्वत की तलहटी में टहल रहा था तो एकाएक आछरियों से मुलाकात हो गयी । लोक मान्यताओं के अनुसार चपल -चंचल -चितभावन न दिख कर कुछ उदास -अनमनी -असहज सी दिख रहीं थी सब । मैंने उदासी का कारण पूछा तो उनकी आंखों में छाए उदासी के बादल बरस पड़े ।
बहुत जोर देने के बाद आछरियों ने कहा जब हम पर यह इल्जाम लगा करता था कि हम युवाओं का हरण कर लेती हैं ,तब उस वक्त इस क्षेत्र के गांवों में जीवन की रौनक रहा करती थी । धन -धान्य -फलों -फूलों से भरपूर । घाटी में बहने वाली भिलंगना नदी की तरह यहां भी जीवन कल -कल कर बहता था । साल दो साल में कभी कोई युवक हमारा हो अपना घर भूल भी जाता था तो भी गांव युवाओं के गीत-संगीत- नृत्य से खिलखिलाता रहता था ।
पर अब तो दिल्ली -देहरादून -मुम्बई में बैठी विकास की आछरियों ने सब बदल दिया है । जो गया वहीं का हो गया । घाटी में भिलंगना का मुक्त प्रवाह जब से रुका ,पर्वतों -वनों में जीवन का प्रवाह थम सा गया है । अब हम कितना ही मोहने की कोशिश करें किसी को , वो हमारी लाख कोशिशों के बावजूद विकास की आछरियों के मोहपाश में बंध चला जाता है । पहले गांवों में विद्युत ऊर्जा न थी पर जीवन ऊर्जा भरपूर थी ,अब बिजली तो है पर बेजान है , जीवन ऊर्जा लुप्त हो गयी ।
ऐसा कह आछरियाँ जाने लगीं तो मैंने कहा अगर बुरा न मानों तो एक सेल्फी हो जाय तुम्हारे साथ । आजकल आधुनिकता का प्रचलन है कि किसी का दुख हो या शोक , सेल्फी जरूर खींचनी चाहिए ।
एक सेल्फी उदास आछरियों के साथ खींची ,और कभी बिजली की चपलता से चलने वाली आछरियाँ भारी कदमों का बोझ लिए धीरे धीरे वीरान निर्जीव जंगल की तरफ चली गईं ।
#पलायन एक समस्या
Monday, June 11, 2018
"जागृत महादेव"
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केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "
एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विश्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।
उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।👇
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केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "
एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विश्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।
उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।👇
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