Wednesday, September 28, 2022



 कितने सरे सपने होते है किसी हम जैसे लोअर मिडिल क्लास के एक तो पहाड़ो से दूसरा शहर की आपाधापी से दूर जहां न ज्यादा गाड़ियों की आवाजे है न दिन रात की भागदौड़ बस है तो सुबह उठे खेतो में गए या जंगल घास लकड़ी लेने बस इसी से इन पहाड़ो की दिनचर्या चलती रहती है पर उस अभागी बिटिया अंकिता को क्या पता था इन सुनसान और नरम पहाड़ो में अब दानव रूपी असुर आ चुके है
पुलकित आर्य जो सत्ता के मठादिश पर बैठा हुआ बाप की दुर्दांत औलाद थी जिसका जीवन में परिवार पार्टी प्रशासन और पुलिस जो हर उसकी बतमीजी सत्ता की हनक से छुपाते रहे है इतना बिगड़ैल हो चूका था की एक मासूम की निर्मम हत्या करने से भी नहीं चूका उक्त हत्या में जिस प्रकार के घटना कर्म हुए है वो भी कम दुखद नहीं है एक बाप कैसे लाचार हुए अपनी बेटी की ढूंढ के लिए दर दर भटकता रहा जहा हम अपने बच्चो को एक पल के लिए भी अपनी आखो से ुझल नहीं होने देते वो लाचार बाप पटवारी के कारन कैसे इधर उधर भटकता रहा कैसे क्षेत्रीय विधायक अपनी वाजवाही के लिए बुलडोजर चलवा देती है कैसे दुर्बीज का बाप विनोद आर्य सत्ता की हेकड़ी में अपने बेटो को निर्दोश साबित करना चाहता है कितनी अभागी वो माँ है जिसे झूठ का सहारा लेकर प्रशासन अपनी बेटी के अंतिम दर्शन नहीं करने देता कैसे बिटिया के शव को देखने वाले लोग पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर संदेह कर रहे है
कोई भी आम इंसान इस साड़ी  प्रक्रिया को देख कर कह सकते है सत्ता की हनक इसमें छुपी हुई है और ये होता है जब आपको लगने लगे की जनता में अब हम राजा है कोई ना आने वाला है और ना आ सकता है ठीक ऐसा ही तो महाभारत में हुआ था जब द्रोपती का चीरहरण हुआ था कोरवो को भी यही गुमान था की हम ही है और हम ही रहेंगे लेकिन सत्य और असत्य में जीत हमेशा सत्य की ही हुई है अतः धामी सरकार जी आप माने या ना माने आपकी जीत ना आपकी थी ना किसी व्यक्तिगत प्रत्याशी की ये सिर्फ मोदी मय की जीत थी अतः ऐसे बिनोद आर्य जैसे दुर्दांत को सहारा देने की भी मत सोचना इन दुर्दान्तो के लिए फांसी से निचे सजा मत सोचना ये पहाड़ है देवी देवताओ का गढ़ भी जो खुद सजा देना जनता है 


पुनः भावना से दिवंगत बेटी अंकिता की आत्मा की शांति प्रार्थना

 

 कितने सरे सपने होते है किसी हम जैसे लोअर मिडिल क्लास के एक तो पहाड़ो से दूसरा शहर की आपाधापी से दूर जहां न ज्यादा गाड़ियों की आवाजे है न दिन...